बुधवार

विचारों का मृत्यु !


कभी कभी मै कुछ न चाहते हुए भी कुछ सोचने और करने पर मजबूर हो जाते है. उसमे इंसान का कभी कभी जोर नहीं चलता है. इंसान क्या करे और क्या नहीं करे. आखिर ऐसा क्यों होता है , आखिर ऐसा की हो जाता है कि वो नहीं चाहते हुए भी करता है . आखिर ऐसा कौन सा मजबूरी है ?
बहुत सारे सवाल मन में घुमते रहते है. आखिर मै थक कर ये सोचने पर मजबूर हो जाता हू कि मै क्यूँ सोच रहा हूँ. हमारे देश में और भी तो बहुत लोग  है ...वो क्या सोचते है. क्या नहीं सोचते है. उसके बारे में मैं सोच कर अपना वक्त क्यूँ बर्बाद कर रहा हूँ. अपना जीवन के कीमती समय को इन सब बातो में भटका कर क्यूँ नष्ट कर रहा हूँ. !
लेकिन , क्या मै जो कर रहा हूँ या सोच रहा हूँ , यह सही है ? कभी सोचता हूँ अगर मै सिर्फ अपना ही भला सोचता हूँ तब तो ये ये सभी बातें पूरी तरह से सही है.
क्या एक इंसान सिर्फ इतना ही सोच सकता है ? क्या हमारे बीच इंसानियत खतम हो गयी है. क्या हमारे बीच से मानवता समाप्त हो चुकी है. ? क्या हम सब सिर्फ अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए जीते है.?
नहीं....बिलकुल नहीं . अगर ऐसा होता है तो ये संसार कब का संपत हो चूका होता . लेकिन फिर जीवन चक्र चल रहा है. इसका मतलब है कि अभी भी इंसानियत और मानवता बची हुई है.
सवाल यहाँ पर ये है कि वो कहा और कब देखने को मिलेगा....जब पूरी तरह से मानवता और इंसानियत समाप्त होने के कगार खड़ा होगा ? अगर ऐसा है तो ....कुछ नहीं होगा है ....अगर किसी को बचाना हो तो मरने से पहले उसका इलाज करो....मरने के बाद इलाज करने से क्या मिलेगा.....जिदा लाश !
आज हमारे समाज का क्या दशा और दिशा है , सभी लोग इस परिचित है ..कोई भी इंसान इस से अछूता नहीं .......चाहे वो किस भी समाज से रहता हो. छोटे या बड़े सभी लोग में से कुछ लोग इससे से चिंतित है...मै कुछ लोग कहुगा कि जो सबसे ऊपर है ..उन्हें वो लगता है ..कि समाज से या में मैं नहीं ...समाज मुझसे है या चलता है ....और जो एक दम से निचे से आ रहे है....वो इसके प्रति चिंतित नहीं है ..क्यूँ कि उनको न कुछ पता है और न वो कुछ पता करना चाहते है. क्यूँ उनको कुछ मतलब नहीं है ...उनका सीधा सवाल है, समाज ने मुझको दिया क्या ? जो मै समाज से जुदा हुआ मानूं.
तब ऐसे में बचे बीच वाले भाई साहेब... अब वो तो ऐसे फंसे है...जिनका कोई हल नहीं है..उन्हें सांप और छुछुन्दर कि तरह फसे गए है...न तो वो निगल सकते हैं. न उगल (बाहर कर ) सकते है. ऐसे स्थिति में क्या कर सकते हैं. अगर जयादा कुछ करने कि कोशिश करते हैं. समाज के नियम उन्हें पूरी तरह से बाँध देती है. अगर कुछ नहीं करे तो समाज उन्हें जीने नहीं देगा.
आज का समाज , इतने कुंठित हो चूका है कि ....हर इंसान एक दूसरे से कट कर रहना चाहता है...पूरी तरह से पेड के टूटे पत्ते के तरह उससे से अलग हो कर स्वंत्र रहना चाहता है. ऐसे में उस पेड़ का क्या हाल होगा ....जो उसमे पत्ते ही नहीं तो उसको पेड़ कौन कहेगा...उसकी पहचान क्या रहेगी. एक दिन ऐसा समय आयेगा ....जब उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा. फिर इंसान का ,,,,,संसार का हर एक जीव खुद व् खुद समाप्त हो जायेगा.
आज हम सबको एक जुट हो कर परिवार और समाज को विखरने और टूटने से बचाना है. इसके लिए हमें ही कुछ करना पड़ेगा...कोई आसमान से आकार नहीं करेगा.
हमारे समाज में कुछ ऐसे ही प्राणी होते है ...हर हमेशा देश और समाज कि बात करते रहे है...जब समाज को इनकी जरुरत होती है ...तब इनका पता नहीं होता है .ऐसे में इन जैसे लोगों से भी हमारे समाज को बहुत ही बाधा खतरा है.
आज हमारे देश में पचिमी सभ्यता का बहुत प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है. वो दिन दूर नहीं , जब हम पूरी तरह से इस डूब चुके होंगे क्यूँ कि..आज हमारे देश के सभी बडे शहर तो इससे से अछूते नहीं है...धीरे धीरे अब हमे छोटे – छोटे शहर में अपना पांव पसर रहे है., जिस दिने ये गांव में पहुच गए है...समझिए कि पूरी तरह से हमारे भारत वर्ष कि संस्कृति और सभ्यता संपत हो जायेगी.
मै कही और किसी कि सभ्यता को गलत निगाह से नहीं देख रहा हूँ और नहीं बुरा कह रहा हूँ. अगर अच्छी चीजे कही से मिले तो उसे अवश्य लेना चाहिए. आज पूरा संसार हमारे संस्कृति सभ्यता के कायल है. और हम है कि अपने को भूल कर दूसरे को अपनाने में लगे हुए है.
बिखरता समाज और टूटता परिवार ये दोनो ये हमारे देश के लिए विकट समस्या है. अगर हम लोग इस पर ध्यान नहीं दिए तो वो दिन दूर नहीं , जब घर के अलावा कुछ नहीं दिखेगा..
आज कल ये भी सुनने में आ रहा है कि ...बच्चे अपने माता –पिता को अपने साथ रखना नहीं चाहते है.वो या तो उन्हें अपने घर से दुर किसी और घर में या वृधा आश्रम में डाल देते है. अगर जायदा कुछ होता है तो वो कही और छोड़ कर चल देते हैं. ऐसे में उन पर क्या बीतती है. वो उनके अलावा कोई बता नहीं सकता है.
बच्चे जवान होते नहीं कि अपने घर से दूर रहना पसंद करने लगे हैं..अब सोचिये कि अगर ऐसे दशा रही तो हमारे वर्षों पुरानी समाज कि वो परम्परा का क्या होगा है . वो संयुक्त परिवार का क्या होगा ?
ये एक गंभीर समस्या है. अगर हम समय रहे नहीं समझे और कोशिश किया तो ....हमारे देश और समाज का क्या होगा कोई नहीं जानता है...
आप बहुत से परिवार देखें होंगे और देखेंगे , वो बात तो बहुत बड़ी बड़ी करेंगे लेकिन वो इन सब कामो में बहुत आगे रहेंगे.
हमारा देश भारतवर्ष पुरे संसार अपने सनातन धर्म और संस्कृति-सभ्यता के लिए जाना जाता जाता है. लेकिन आज के समय में वही सब नष्ट होने के कगार पर है. यहाँ का हर नागरिक अपने अपने अनुकूल नियम –कानून बना कर कम करता है...जो सोचता है..वही सभ्यता है वही संस्कृति है. और यहाँ तक जो लिख दिया वही संबिधान है.


गुरुवार

विचारों की मृत्यु

कभी मैंने यह सोचा तो नहीं था की कभी की विचार भी मर जाते हैं. लेकिन अब इंसाने के साथ साथ हमारे विचार भी मर ते हैं. ऐसा नहीं है की सिर्फ इंसान ही मरते हाँ. हम पता नहीं अपने इस जिदगी में क्या क्या नही सोचते हैं . और सोचते सोचते इस दुनिया को छोड़ कर चले जाते हैं. अगर कुछ रहता है तो वो हमारा विचार चाहे हो अच्छी हो या फिर बुरी . हमारे समाज में बहुत प्रकार के लोग रहते हाँ. उनके रहने का ढंग उनके सोचने का ढंग यहाँ तक की वो क्या करते हैं मतलब उनके करने का कुछ करने का ढंग भी अलग – अलग होता है.
ऐसा नहीं की हम सिर्फ अलग रहते हैं  बल्कि अलग अलग कुछ सोचते भी हैं. आज जहा और जिस जगह पर हम लोग हैं . शायद ही कोई इसको नहीं जनता है. आज का बच्चा भी ये जानता है  की हमरे परिवार , समाज और देश में क्या हो रहा है , क्या होना चाहिए. जब भी हमारे परिवार की बात होती है तो हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं. अगर वही चीजे हमारे पडोसी के यहाँ हो तो उसके एक बहाना मान कर सिर्फ तमाशा मान कर देखते हैं और एक दूसरे जगह उसकी खिल्लियां और मजाक बनाते चलेंगे. तो फिर आप क्या सोचते हाँ. जब आप अपने पडोसी को सुखी नहीं देखना चाहेंगे वो समाज को क्या देखेंगे.
समाज हमारे देश का प्रतिविम्ब है. अगर हमारा समाज अच्छा होगा समाज के संस्कार जितने अछे होंगे उतने ही हमारे देश का मान और सामान भी उतना ही अच्छा होगा. जब तक हमारे समाज में सुचार नहीं आयेंगे तब तक देश का कुछ भी भला नहीं होने वाला.
समाज की पहली कड़ी परिवार होती है. क्यूँ परिवार से समाज बनता है. परिवार हम जैसे लोगों कसे बनती है . जब तक हम सभी नहीं होंगे . हमारे विचार सही नहीं होंगे एक अच्छे परिवार की कल्पना करना बेईमानी होगी.  अगर हम अपने इतिहास को देखेंगे तो पायेंगे की किस तरह का परिवार होना चाहिए , परिवार का सद्स्य होना चाहिए. एक पिता , एक पुत्र, एक माता , एक बेटी और एक पत्न्नी का एक परिवार और समाज के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए.
हमारे देश में एक से एक महाकाव्य और महाग्रंथ है जो इस बात को बताते है और समझते है . की हमारे क्या संस्कार थे और क्या होना चाहिए. महाकाव्य गीता, रामायण और रामचरित्र मानस को अगर हम पढेंगे और समझेंगे तो शायद हमें और किसी दूसरे को बताने की जरुरत पड़ेगी. मै किसी किएक धर्म या मत की बात नहीं कर रहा हूँ . ऐसा एक संसार के सभी धर्मो में बताया गया है.
परिवार का मुखिया का क्या कर्तव्य होना चैहिये ? ऐसा हम अपने आसपास देखेंगे तो पायेंगे की वो तो एक ऐसा होना चाहिए जो हर किसी कर मान सामान के साथ उसके कर्तव्यों को भी उससे याद और बताते रहने चाहिए. जिससे से उनको अपने और दूसरे के प्रति क्या कर्तव्य है. उन्हें ज्ञात होना चाहिए.
एक पिता का अपने पुत्र और पुत्री और एक पत्नी के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए. ये शायद ही कोई प्राणी नहीं जानता हो. हमारे देश में जनम से लेकर मंरते दंतक लोग एक दूसरे को ज्ञान और अपना कर्तव्य बताते रहते हैं. ऐसे सिर्फ हमारे देश में ही होता है. जो कुछ विचार ही . वो खुद बनते है. और खुद भूल जाते है. पहले एक दूसरे के विचारों का सम्मान करते थे. क्यूँ वो विचार हमेशा से एक दूसरे ,परिवार और समाज के हित में होता था . हमेशा से हो वो लोग परिवार और समाज के हित के लिये होता था. आपसे में इतना प्रेम था की वो कभी भी मेरा नह होता था. वो हमेशा से अपना और हमारा को ही जानते थे.
लेकिन आज का विचार है . वो सिर्फ मेरा और मेरा ही दीखता है और कुछ नहीं. न तो अपने माता – पिता को जानता है . न तो भाई – बहन . सिर्फ और सिर्फ अपना अपना बेटा और पत्नी .
और तो और अपने आस पास कोई भी भूल जाता है .
इतना दुःख होता होगा उनपर जिन्हीने इन जैसे लोगो को जन्म दिया होगा . कैसे ये लोग दिन – रात एक कर अपने बच्चे को पलते है. एक दिन ऐसा आता  है . की यही बच्चे बड़े होकर अपने जनम देने वाले अपने माता – पिता को भूल कर उनहे अपने से दूर चले जाते हाँ. क्या कभी सोचा है. नहीं
लेकिन शायद उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए. की जो वो आज कर रहा है . शायद उनके साथ भी वही कहानी दुहरायी जायेगी. ऐसा नहीं है की वो अपने माता पिता के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करेंगे और उनके साथ ऐसा नहीं होगा. कदापि नहीं.
वो समय को वो भूल जाते हैं. जब वो अपने भाई बहन के साथ अपने जिंदगी का आधा जीवन इनके साथ गुजारते है. वो घर के एक दूसरे के साथ लड़ना झगडना , वो साथ स्कूल जाना , एक थाली में और एक टिफिन में साथ लड़-झगड कर खाना खाना.
कैसे लोग भूल जाते हाँ. वो होली के दिन , वो हो दिवाली क्या बताऊँ ...रोना आ जाता है. कुछ समझ में नहीं आता . जब भी मै सोचता हूँ .....कुछ कह नहीं पाता.
जहा पर मै रहता रहता हूँ...उसी के आस पास एक चाचा जी रहते हाँ...हम लोग उनको चाचा जी रहते है. उनको मै बहुत दिनों से देखता आ रहा हूँ....मै उनकी एक बात क्यूँ बता रहा हूँ....एक ऐसा हुआ की ...चाची जी ...हमारे घर पर आये ...तो मैंने उन्हें बहुत उदास देखा...उनकी उम्र ६० से जयादा थी . उनके चेहरे पर उदासी बता रही थी की जो भी कुछ है वो ठीक नहीं है. बाद में मैंने पाता किया तो मालूम चला की उनके एक बेटा और २ बेटी है. बेटी की शादी हो चुकी है. और बेटा ने लव मरिअजे (शादी) की की है.  जजो उनका बेटा था वो उनका नहीं था  मतलब बेटे को गोद लिया था . अपने बेटे को किसी तरह से लन्दन में पढाया लिखाया. लेकिन जब वो घर आया क्या उनके साथ बिता ..जयादा तो नहीं बता सकता हूँ ..लेकिन जो हुआ वो अच्छा नहीं हुआ. उनके घर में ३ फ्लोर है. निचे वाले पर इनका बेटा और बहु रहती है. पहले वाले पर चाचा और चाचीजी रहती है. आज ऐसा है की वो आपने खाना पीना अलग अलग बनाते है और खाते है. अगर वो बीमार भो होते है. तो न उनका एटा और बहु देखने जाती है. उनकी बेटी अपने घर से आकार सेवा करती है.
तो फिर आप बताइए की आज का विचार कहा पर खड़ा है ....क्या हमारी सोच रह गयी है...हर एक दूसरे अपने लिए सोचते है. कोई भी ऐसा नहीं है जजो अपने से उठा कर परिवार , समाज और देश के प्रति सोचे .
हमारा देश एक ऐसा देश है जहा पर विभिन्न प्रकार के लोग और धर्मानु रहते है. लोग अपने विचारों की ऐसे मार लिया है ...जैसा की जो भी वो कर रहा है और सोच रहा है ..वो सबसे अच्छा है ...मरने के बाद सबकुछ अपने साथ ले जायेगा....

शनिवार

समय : कितना अच्छा और कितना बुरा !

जब हम बच्चे थे तो शायद ये बातें  जो मै बता रहा हूँ शायद हर कोई कितनी बार सुने होंगे. ये ऐसा कथन है जो बिना सुने रह ही नहीं सकता है. वो कथन  है  " समय मूल्यवान है इसे व्यर्थ में नष्ट ना करो " उस समय तो हम  लोग ऐसे है सुनते थे जैसे पता  नहीं क्या पका रहे है फालतू की बात सुना सुना कर हमर भी समय ख़राब करते रहते है . ये बाते हमें कोई ना सुनाये ऐसा नहीं हो सकता है . घर पर हो तो दादा जी , दादी जी , पिता जी , माता जी और हाँ  यहाँ तक बड़े भैया ही ऐसे बाते हमें सुनाया या बताया करते थे.  ऐसे बाते का अंदाजा हमें नहीं था लेकिन १०० प्रतिशत सही है . आप चाहे जो भी सोचें लेकिन मैं इसे सही मानता हूँ. क्यूँ मैंने आज तक जो भी सोचा है पाया है वो वात आज सही जा रही है. जब हम स्कूल में थे उस समय उनकी कही बाते आज भी हमें याद आती हैं और रुलाती है क्यूँ हम लोग उस को बिना जाने टाल जाते थे . कोई बात नहीं थी उस समय हम क्या सोच रहे थे. आज जो भी सोचें लेकिन उसका रिश्ता कही ना कही आज से भी है और कल भी रहेगा .
 जब हम लोग कॉलेज में गये तब तो हमें आदत है नहीं थी सुनने कि . हम तो सिर्फ बोलते थे और सिफर बोलते थी चाहे कि सुने या ना सुने. वो २-४ साल ऐसे गुजर गये कि क्या बताऊँ . जब याद करता हूँ तो लगता है वो एक आजाद समय था ना कोई कहने वाला ना कोई सुनने वाला सिर्फ अपनी धुन थी. लेकिन ऐसा समय कब तक चलने वाला था . जैसे ही हम लोग कॉलेज पास कर निकले कि हमें इस ज़माने का पटा १ साल के अन्दर ही लग गया जब हम एक दूसरे से बिछड़ कर अपने अपने रोई रोजगार के लिए इधर उधर भटकने लगे. तब जाकर हमें मल्लों चला कि दुनिय कैसे है कौन अपना है और कौन क्या है. भैया तब भी हम लोग नहीं संभले . उस समय तक भी हम लोग अपने अपने धुन में गाना गाते चले वही पुराना राग रगते रहे . दिन प्रति दिन बीतने लगा . जब हार कर हमें कोई नौकरी नहीं मिली तब हम अपने घर को वापस चले. जैसे हम लोग अपना घर पहुचते है ऐसा लगता है जैसे हम लोग स्वर्ग पहुच गये . लेकिन कितने लोग ऐसा सोचते हैं . जब हम पढाई कर रहे थे. तब हमें ऐसा लगता नहीं था  क्यूँकि उस समय हम दूसरी दुनिया में जीते थे. क्या मम्मी क्या पापा , है ना , लेकिन जब हमें लगा कि दुनिया कुछ बदली बदली है तब हमें अपने और अपनों का अहसास हुआ . दोस्तों समय कब बुरा हो जाए कोई नहीं जनता है . परन्तु हमर माता पिता हमेशा ही चाहे समय कितना ही ना बदल जाए उनका वक्त आपके लिए नहीं बदलत है. वो हमेशा एक सा ही होता . आप हमेशा ही उनके लिए छोटे बच्चे के सामान होते है .

मंगलवार

देश का भविष्य : दशा या दुर्दशा

किसी भी देश का भविष्य हमारे बच्चों पर निर्भर करता है. लेकिन हमारे देश में बच्चों के प्रति जो नजरिया है या हम लोग देख रहे है. क्या आपको लगता है कि आगे जाकर यही बच्चे हमारे देश का कर्णधार होंगे. कभी नहीं. क्यूँ ९० पर्तिशत तो कुपोषण का शिकार हैं. कुछ बच्चे तो जो चाहते है वो मिल जाता है  लेकिन हमारे देश में देश में ऐसे भी बच्चे है जिनको दो वक्त का खाना भी नहीं मिल पटा है . शिक्षा कहा से लेंगे .
अभी हमारे समाज को बहुत कुछ बदलना पड़ेगा . अपनी सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा . उंच नीच को मिटाना पड़ेगा . विचारों कि संकीर्णता को हटाना पड़ेगा तभी इन बच्चो का भविष्य कुछ हो पायेगा.
ऐसे में अगर कुछ संस्थाए नहीं हो तो क्या होगा इश्वर ही नहीं जान पाएंगे. अगर जो कुछ इस के लिए कुछ हो रहा है कुछ बिना लाभ वाली संस्थाए कर रही है . ऐसे  हम सबको एक जुट कर इनके ऐसे संस्थाए को मदद करनी चाहिए. जिससे इन बच्चे के साथ हमारे देश का भला हो सके.
अक्सर हमारे देश में इन गरीब बच्चो के लिए पैसा अआते है लेकिन इनके पास कितना और क्या पहुचते है. शायद कोई नहीं जानता है. आज हमारे देश के हर राज्य में कितने ही बिना प्रोफिट वाली संस्थाए काम कर रही है . ऐसे में हमें आगे आकार इनका स्वागत और मदद कर कुछ हौसला बाधा सकते हैं जिनसे ये आगे काम कर सके .

गुरुवार

कौन कहता है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है ?- 3

कौन कहता  है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है ?- ३. जो भाई मै लिखा है वो सिर्फ मेरा अपना विचार है.. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ खोखला है अगर आप सोचेंगे तो शायद आपको भी वो समस्त बातें नजर आ जाएँगी .अगर आप अपने समाज में देखेंगे तो पाएंगे कि हमारे आस पास वो सारी चीजे व्याप्त है जो हम लोग पर्तिदिन देखते है .
 आज हम सब के बच्चे स्कूल जाते है . क्या आपने सोचा हिया कि जिस स्कूल में हमर बच्चा यानि देश का भविष्य जाता है उः पर हमारी मातृभाषा का उतना ही सम्मान है जितना अंग्रेजी का . शायद आप है सोच रहे होंगे कि मै कहना छह रहा हूँ...लेकिन दोस्त मै वही कहना चाह रहा है जो आपको भी पता है . लेकिन आप उसको सोचना या जानना नहीं चाहते है  तो कोई कैसे आपको बता या समझा सकता है ...आप खुद सोच सकते हो कि क्या और कैसे हमें और हमारे देश के साथ रहना है .
 प्रत्येक इंसान का अपना एक कर्तव्य होता है ... कोई याद रखता है कोई भूल जाता है... इसमें उस इंसान कि क्या सही है और क्या गलती है . आप खुद इसका अंदाजा लगा सकते है.. इस कोई भी दूसरा इंसान आको कुछ नहीं कह सकता है ...
ये तो इंसान कि खुद कि सोच होती है ..कि वो कैसे रहना चाहता है  और क्या करना चाहता है...
 अंग्रेजी हमारी जरुरत कि भाषा है ना कि हमारी मातृभाषा . उसको हम रोजी रोजगार के प्रयोग करते रहना चाहिए ...उसको हम अपने जीवन में ढल कर मातृभाषा का दर्जा नहीं दे सकते है. हिंदी एक भाषा है जो हम सब को एक डोर से बांध कर रख सकता है . आज हमारे देश में  स्कूल का जो हाल है ...उस को सोच कर हैरान हो जायेंगे... कुछ ऐसे स्कूल  hai जहर पर हिंदी बोलने पर जुरमाना लगता है.  जरा सोचिये क्या हाल और सोच है ऐसे स्कूल के ...
हम दूसरे पर दोषारोपण करते है . लेकिन हमारे घर में ही हमारे समाज में जहा हिंदी बोलने पर जुरमाना लगाया जाता है  वह पर हिंदी दिवस और हिंदी सप्ताह बोलने मानाने का क्या औचित्य है . क्या हमारी सरकार कुछ कर सकती है? क्या हमारा संभिधान  कुछ कर सकता है. नहीं कभी नहीं
अगर कुछ करना है और कोई क्कुह कर सकता है ..तो वो है आप यानि हम सब. क्यूँ हम सबके बिना ऐसा होना संभव नहीं .सोचना भी असंभव है .

रविवार

कौन कहता है की हमारी मातृभाषा हिंदी है - 2

कौन कहता है की हमारी मातृभाषा हिंदी है , पहले पढ़  कर शायद सभी को यह अट पटा लगेगा . लग्न भी चाहिए. क्यूँ आप सोच रहे होंगे की मै आप सबको क्या बता रहा हूँ आप सबको क्या समझा रहा हूँ...या फिर मै आपको क्या समझाने की कोशिस कर रहा हूँ....जिसका की कोई अंत ही नहीं है....
 आप ही बताओ....की आपके ही घर में आपका अगर इजजजत नहीं   हो तो आप क्या करेंगे . सोचिये हमारे देश में जितने भी राज्य है सभी की अपने अपनी क्षेत्रीय भाषा है. ये अच्छी बात है की अपना आलग पहचान बनी है ...अआपने भाषा को लेकर ....लेकिन जो एक देश  को एक कर करने की कोशिश करती है..वो है - हिंदी . लेकिन क्या हिंदी को आप मन से मातृभाषा मानते है...शायद नहीं....आप अपने दिलपर हाथ रख कर सोचिये...क्या कभी आपके मन में ये ख्याल आया है की हम अपने बच्चे को अपने मातृभाषा के बारे में उससे बताये... कुछ एक राज्य को छोर कर ऐसा कही नहीं होता है...कुछ असी सहर में तो ऐसे भी परिवार मिल जायेंगे जो अपने बच्चे को हिंदी से ऐसे अलग कर रखते है जैसे हिंदी एक ऐसा कीड़ा है जो अगर कट लिया तो ये कभी ठीक नहीं हो पायेगा....सुबह से शाम तक उसे अंग्रेजी वाली गोली और टोनिक पिलाया करते है...अरे भी जो अपने समाज अपने परिवार अपने देश ला नहीं हुआ तो किसी का नहीं होगा ....इंग्लिश यानि अंग्रेजी भले ही हमरी जरुरत की भाषा बन जाए ये कभी भी दिल यानि समाज और हमारे  देश की भाषा नहीं बन सकता है....हमारी संस्कृति  में समा नहीं सकता है.... दोस्तों सभी परिवार , समाज और देश की एक अपनी पहचान होती है...ऐसा अगर  आप  मानते हो तो आप अपने भाषा की मानसम्मान से कभी भी समझौता नहीं करोगे...  हमारे देश में जो कुछ भी हो रहा है...वो सही नहीं हो रहा है... अगर किसी भी परिवार ,, समाज और देश को अगर बर्बाद करना है तो उसके युवा पीढ़ी  को अपने रस्ते से भटका दो...वो  समाज और वो देश स्वयं भटक जायेगा और एक दिन बर्बादी के कगार पर पहुच जाएगा.....
आप इतिहास को देखो...किसी भी देश का भविष्य युवा पीढ़ी  पर निर्भर करता है...तो हम भी अपने युवा से ये आगढ़ करना चाहते है....कि दोस्तों ....आओ आगे बढे और एक नया दिशा एक नया आयाम एक नया राष्ट बना कर अपने परिवार , समाज और एक शाशाक्त देश का निर्माण करे. उसके लिए हमें अपने देश कि  मातृभाषा  को सम्मान  का  ख्याल  रखना  पड़ेगा . ऐसा नहीं  है  कि   हमारे देश में हर एक राज्य का अपना भाषा है अगर हम अपने मातृभाषा का ऐसे ही अपमान करेंगे तो दूसरे देश वाले हमारे देश  कि भाषा का क्या  मान  करेंगे  .
हमारे देश में जो शिक्षा  का परचालन था और आज क्या है ये आप लोगन से छुपा ही नहीं है...पूरी तरह से हमारे देश कि भाषा के साह मजाक बना कर रख दिया हिया....शायद आप को ये लग रहा है कि ...मै किसी तरह का इंसान हूँ जी अपने देश कि परगति से जलता हूँ ,,, नहीं मेरे देश दोस्त मै ये सोच रहा हूँ कि इस प्रगति में कही हम अपने को ही खो दूँ जो कभी हमारे ये स्तम्भ थे.... अपने जीन को ना खो दू... मै अपने जमीन का समझौता कर आगे नहीं बढ़  सकता हूँ....मुझे प्रगति उतनी हिपयारी है जीतीं हमरी संस्कृत अरु सभ्यता ....हम दूसरे देश को भी तो देख सकते है...जो अपने संस्कृत अरु सभ्त्य के बेच कर प्रगति को नहीं अपना रहा है....हमें इसका भी क्याल करना पड़ेगा और करना चाहिए.....

गुरुवार

कौन कहता है की हमारी मातृभाषा हिंदी है ?

कौन कहता है की हमारी मातृभाषा हिंदी है ?--- दोस्तों मैंने इस पर लिखने से बहुत बिचार किया सोचा समझा तब जाकर इस विषय पर लिखना श्रुरू किया है. शायद आपको यह जानकार , देखकर या सुनकर बहुत दुःख होगा की अपने देश हिंदुस्तान यानि की भारत वर्ष में अपने ही भाषा कई जितना अपमान हो रहा है शायद ही किसी देश में ऐसा होता होगा. हर कोई देश अपने मातृभाषा से बेहद प्रेम करता है. आप किसी भाषा को देख ले उन देशो को देखें उनका इतिहास आप देख सकते है. मैं ये नहीं कहता हूँ की आप दूसरी भाषा नहीं जाने सीखे या बोले. मै तो इतना कहता चाहता हूँ. की आप अगर अपने ही घर में अपने मातृभाषा को जगह नहीं देंगे प्रेम नहीं देंगे तो दूसरे देश वाले क्या देंगे. आप ही बताइये ऐसा कभी हो सकता है क्या ? नहीं ना . बस अब आप को हमलोगों को ये सोचना है . की अपने देश में किसको जगह देना है.
 आप को मै कुछ तस्वीर दिखाना चाहता हूँ..इस से आप को कुछ याद आ जाये . हमारे देश में हिंदी को कितना महत्वपूर्ण है.

ऐसे ऐसे होर्डिंग्स आपको सभी शहर में मिलेंगे . ऐसा नहीं है की आपको सिर्फ मेट्रो शहर में हि मिलेंगे.  अपने देश के छोटे और बड़े शहर सभी जगह इंग्लिश यानि अंग्रेजी का प्रचलन है. आपको ये नहीं लगता है की धीरे धीरे हम अपने हिंदी भाषा को सिर्फ बोलने में ही इस्तेमाल करते है. यहाँ के लगभग लोग सिर्फ बोलते तो हिंदी है...लिखते है. अंग्रेजी है...
वाह रे वाह क्या बात है ...बोलना है की हिंदी हमारी मातृभाषा हिंदी है. लेकिन करना हिंदी है. 
 अगर हम कुछ एक सरकारी कंपनी की विज्ञापन और कामकाज को छोड़ दे तो आपको हिंदी का विज्ञापन और काम काज नहीं मिलेगा . यहाँ तक की सरकारी कंपनी भी बोलती है की हम हिंदी में काम करते है...आप भी कर सकते है. जब आप उससे हिंदी में काम करने के लिए कहेंगे तो तो कन्नी काट लेते है. आज ऐसा हो गया है की बोलना कुछ है करना कुछ है .
 मैं नहीं कहता हूँ की आप हिंदी के अलावे कोई भाषा का इस्तेमाल ना करे . क्षेत्रीय भाषा भी हमारे देश की भाषा है . पर हमें हिंदी का भी तो सोचना है ....ऐसा ना हो की संस्कृत की जगह हिंदी भी गायब हो जाए. जैसा आज संस्कृत का हुआ है....हर कोई जानता है. आज का बच्चा भी मुह बना लेता है...अरे अरे अरे हिंदी.................. arrrrrreeeeeeeeeeee संस्कृत नहीं मुझे नहीं आता है........
  तो दोस्तों हमें ऐसे होने से बचाना है...क्षेत्रीय भाषा के साथ हमें हिंदी का भी सम्मान देना है.....कोई भी देश का एक अपना मातृभाषा होता है..वो उसकी पहचान होता है...अगर आपके पास कोई पहचान ही नहीं है तो आप क्या है. ऐसे तो कोई जानवर भी रह लेता है...अआप अंग्रेजी को अपना सकते है..पर हिंदी को नहीं......जरा सोचिये.....
हमारे ही देश में हिंदी का अपमान एक बार नहीं सौ बार हुआ है और शायद आपके आसपास और आपके सामने हुआ होगा लेकिन आप चुप चाप सुनते रहे ....कैसा महसूस होता है ...जब कोई आपको सामने से अपमान करे.......कभी सोचा है आपने ...तो सोचिये........खुमार बहुत है मेरे सिने में लेकिन उसका क्या फायदा ...जब आग भुज जाए ...
आगे हम फिर मिलते है......लेकिन सोचियेगा जरुर......