गुरुवार

तुम बोलो तो सही, हम बोले तो गलत !

समाज में आचार और विचार का प्रभाव कितना गिर गया है की आप सोच नहीं सकते हैं. हर कोई अपने आप को सबसे अचछा और समझदार मानता है. मुझसे अच्चा इंसान तो इस धरातल पर कोई है ही नहीं. जो मई बोल या कह रहा हूँ वही सब ठीक है. सोलह आने सच है , बाकि जो बोलते हैं या कहते हैं ...वो बेबकूफी है.
इसी तरह का शब्दों का आदान प्रदान हमारे समाज के सबसे सभ्य और समझदार विद्वान समाज से सुनने को मिल रहा है . मैं जब से होश संभाला है. यानि जब से मुझे याद है और मेरी याद्दाश के के मेमोरी में है. लगभग नेताओं और उनके सगे सम्भ्धियों के बोल बिगड़े हैं. हर एक पार्टी में कुछ नेता ही हैं जो अपने शोब्दों को टोल -मोल कर बोलते हैं , बाकि तो चमरे के मुह है , जो निकलता है वो ब्रह्वाक्य है.
मुझे याद है बिहार जाति वाद के आग में झोकने वाले दो नेता , आज कल संत की भाषा समझाने में लगे हैं, हर दुसरे पार्टी के नेता को नसीहत दे रहे हैं. ये गलत है और ये सही. कमाल है . नौ सो चूहे खाकर , बिल्ली चली हज को. ये कुछ हजम नहीं होता है . क्या करें.
पिछले कुछ दिनों से तो ये नेता लोग , एक अनपढ़ और गवार से भी गये गुजरे भाषा का इस्तेमाल करते आ रहे हैं. अगर किसी ने मुझे गाली दी , मेरी बाप को गली दी, मा को गाली दी, मई चुप चुप सहन कर गया . तब कोई हल्ला गुल्ला नहीं मचा, एक दो दिन में सब शांत हो गये . क्यूँ मैं साम्प्रदायिक था , आरएसएस का एजेंट था . जब हमारे कुछ भाई ने कुछ जुमले देकर उदाहरण दिया तो ...***ड में मिर्ची लग गयी है. सिर्फ नेताओं को नहीं , बल्कि सबसे भ्रष्ट विभाग मीडिया यानि प्रत्कारिता करने वाले को भी जलन होने लगी.
भाई मिर्ची ऐसे जगह कैसे लग गयी , मैंने तो ऐसा कुछ किया नहीं .....
कैसे नहीं किया ...आपने गलत जगाह लगाया......
लेकिन आपने जो पहले डंडा दिया था.......तब तो किसी की आवाज नहीं आई थी.....तब तो बड़े हंस रहे थे......अब दर्द हो रहा है तो ...**ट रही हिया....आये .....
कोई कालिख पोतने की बात करता है, अरे भाई. हम थोड़े ही न किसी जानवर का हक़ छीने हैं.....पृष्ठभूमि .......देखना है ....हा हा हा हा .....पहले अपना इतिहास देखो...साहेब.....खुद का पृष्ठभूमि दिखाई देगा....कहा थे ...कहाँ पहुच गये...
नेताओं के कोई धर्म नहीं होता है . न कोई ईमान. जब चाहे वो बेच दे....सिर्फ सिर्फ सिर्फ चाँद पैसों के लिए....
गलती तो हमारी है.....जो इन जैसों को वोट देकर समाज को बाटने का ठेका दे देते हैं......और फिर सर पकड़ का बैठ जाते हैं.
न तो ये सुधरेंगे ...न ये कुछ करेंगे. !!!!!!!!!!!

प्रकार के लोग ....


हमारे समाज में प्रकार - प्रकार के लोग है. हर कोई अपने को सबसे अच्छा और अपने को सबसे बड़ा ईमानदार कहता है. यहाँ कोई किसी से छोटा नहीं है. हर कोई महान आत्मा है . भगवान् और ईश्वर भी इन इंसान के आगे छोटे हैं. जो ये इंसान सोच सकते हैं. कर सकते हैं अपने आप को बदल सकते है  वऐसा तो भगवान् भी नहीं कर सकते हैं.
आज आप जहाँ पर नजर डालेंगे वहाँ देखेंगे हर कोई एक दुसरे को चोर और अपने को सिपाही कह रहा है. जब हमें कोई जिम्मेदारी मिलती है. तब हमें अपने आप को दिखने का मौका मिलता है. तब ही हमारी औकात मालूम चलती है की हम कितने पानी में हाँ.
सिर्फ बोलने से काम हो जाता तो शायद में आज मैं भगवान् से भी ऊपर जाकर बैठ जाता ...ऐसा हर इंसान सोचता हैं. लेकिन उसके करने के लिए बहुत कुछ खोना नहीं बलिक करना पड़ता है. बिना किये कुछ हासिल नहीं होता है. बने बनाये घर में तो हर कोई आराम से रह लेता है लेकिन जब खुद उसकी मरमम्त की जरूत पड़ती है तब मालूम चलता है की कितना मेहनत है घर को बनाने में .
एक इंसान एक परिवार को ठीक ढंग से चला नहीं पता है उसके चलाने के लिए क्या क्या नहीं करने पड़ते हाँ क्या क्या ख्याल आते हैन . कभी आप सोचियेगा हम अपने परिवार को कैसे चलाएंगे . पिता जी माता जी , बहन और भाई , इन सब के अलावा पत्नी और बच्चे , इन सब को संभालना और खुश रखना कितना बड़ा काम है , आप उनसे ही पूछिये जो चला रहा हैं. जब तक पिता जी चला रहेंगे तब तक तो आप हमेशा उनके खिलाफ होंगे . ये नहीं होता है वो नहीं होता हिया . बेकार हैं , इनसे कुछ नहीं होगा , मेरे ऊपर छोड़ दीजिये .मैं कर के दिखा दूंगा . बात सुनते - सुनते एक दिन आपके पिता जी ने कह दिया बेटा अब तू संभाल ले. फिर देखिये .....कितना मजा आयेगा.
जब तक आप अपने पिता जी के साथ - साथ इन सब में अपनइ भागीदारी नही देंगे ...इसे चला पाना बहुत कठिन है ...बहुत म्हणत करनी पड़ेगी. लेकिन कैसे ....आपके पास पेशेंस होना चाहिए. नहीं तो आप इसको बीच रस्ते में छोड़ देंगे. क्यूँ की आप ये आप से नहीं हो पायेगा. जा ताने आपने अपने पिता जी को दिए थे वो आपको भी मिलेगे. और छोड़ेने से कुछ नहीं होने वाला. कब तक भंगेगे ......सोचिये.
आरोप लगाना बहुत आसान हैं, कभी अपने ऊपर लगे तो सोचियेगा .......जब अपने घर में कोई काम के लिए रखन होता है तो देखे हेई की जो लड़का है काम करने वाला है या बहाने वाला.....

मंगलवार

मायने अपने अपने

कल बहुत दिनों के बाद मैं किस टीवी पर डिबेट देखा।  चैनल का नाम इंडिया न्यूज़ था बहस का मुद्दा कल के दिए हुए बयां जो की माननिये सुप्रीम कोर्ट यानि की उच्चतम न्यायालय ने दिया था साईं और शंकराचार्य के बीच चल रहे मुद्दे को लेकर।

जो मैंने देखा उसे मैंने क्या समझा वही मैं यहाँ पर लिखना चाहता हुँ. होस्ट कर कर रहे मिस्टर अभिनव का भी कुछ  संवाद और बोलने का ढंग सही न था।  वो हमेशा साईं और साईं के भक्त का पक्ष ले रहे थे।  उनकी बातों से मुझे यही लगा , आप चाहे तो देख सकते हैं. मैंने उनके वेब साइट से लिंक लेकर यहाँ पोस्ट किया है.

अब आते हैं वह बैठे कुछ लोग पर जो बहस में भागे लिए थे।
१. श्री रमेश जोशी जी - जिन्होंने या पिल कोर्ट में दिया था और पुरे बहस में कुछ जगह को छोड़ कर शांत थे।
२. श्री रावत जी - (शंकरचार्य समर्थक ) - आवाज उची थी पर वो अपशब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे।  जो भी कह रहे थे मर्य्यादा में रहते हुँ. ।
३. श्री महामंडलेश्वर नरेश जी - शांत स्वभाव के सही बातों के चयन करते हुए सही बात कह रह थे।
४. मिस्टर संजय  - मैं यहाँ श्री और जी का इस्तेमाल जान बूझकर नहीं कर रहा हूँ कि ये महाशय दोनों को योग्य नहीं है. नहीं तो भाषा के ज्ञान और नहीं तो संस्कृति और सभ्यता की बुझ. गीरी  हुई शब्दो के चयन।  सबसे पहल देश का नागरिक होते हुए अगर ोकोई बाँदा सामान सहिंता की बात करे तो वो देश और समाज का दुश्मन।  और कोई अपने इष्टदेव का मंदिर बनवाए तो वो देश और  दुश्मन. वाह रे मानसिकता।  राजनीती से ओट प्रोत इनका दिमाग है. इस बहस में इन्होने ३७० और श्री राम मंदिर की बात भी बीच में उठाया थ. क्या इनकी सोच है  हर कोई जानता है।  जो इंसान इस देश में है उसका हक़ है की वो सामान नागरिक संहिता की बात कर सकता है।  पहले इस देश का नागरिक बाद में वो धर्म गुरु और कुछ और है. लेकिन इस महाशय को तो इस धर्म की बात में भी राजनीती करनी है।
और एक बात इस महाशय ने कहा था की चांदी के आसान और विलासता सम्बन्धी चीजो इसतेमाल कर क्या साबित करना चाहते है।  शंकराचार्य ही सिर्फ सनातन धर्म के रखवाले नहीं है है.

बात सही है की आज धर्म के गुरुओं ने सनातन धर्म की फजीहत की हिा. ऐयाशी भरा जीवन जीते है. लेकिन ये बाते साईं जी पर नहीं लागु हःती है.

आज जितने भी मंदिर हैं उसमे में सभी में आस्था काम व्यापार जयादा है. उन सबमे सबसे जयादा वयापार कंेद्र है साईं मन्दिर. आप घर जगह देखे साईं मंदिर व्यापर का केंद्र खुला हुआ मिलेगा.

मंदिर को इन सब ने मिलकर दुकान बना दिया है. और मिस्टर संजय आपका भी रोजी रोटी आईएनएस दुकानो से ही चल रहा है।  आपको बुरा लग रहा है पर ये सच्चाई है. आप चाहे इसके लिए मुझे जो कहो या करो पर ये सच्चाई है.

आप एस्ट्रोलोजर तो ही है पर आपकी मानसकिता पर मुझे सवाल है.  अगर कोई देश और समाज की बात करे तो गलत और आप सही  है.  अगर इतना ही सही भक्त हो तो जिस तरह का भाषा का इस्तेमाल इस बहस में किया है।उस्से देख कर लगता है की आप कौन हो।  राजनीती से उठ कर और साईं जी के नाम का दुकान से हैट कर कुछ अच्छी मानसिकता के साथ देश और समाज में योग दो।  मैं जयादा तो नहीं जानता लेकिन जो समझता हूँ उसे से तो यही अच्छा लगता है. मुझे तो तज्जऊब लगता है कैसा देश है मेरा जो आप जैसे मानसिकता वाले लोग को ऐसे बहस में बुला लेता हैं. जहाँ देश की हिट में बात करने पर वो दुश्मन हो जाता है. क्या इसे बात पर गर्व हो.

ऐसे मानसिकता को लेकर हिंदुस्तान जैसे देश में ही आपकी दुकान चल सकती है.

५. दीदी सोनिया जी  - सादगी तो नहीं पर शांत स्वभाव पर जयादा देर तक सहने की शक्ति नहीं।
६. चक्रपाणि जी - देखने में तो संत पर संत जैसे कोई गुण  नहीं।  सिर्फ दूसरों को उदेश देना अपने उअपर कोई जोड़ नहीं।  दुनिया और सनातन धर्म के अंधकर में ल जाकर अपनी दाल रोटी चलना।  यही उद्देशय है इन महाशय का / इस से जयादा इनके बारे न बोलूं तो सही है।  क्यों आईएनएस जैसे धर्म गुरुओं ने ही सनातन धर्म का बंटाधार किया हिा. साथ में मिल जाते है मिस्टर संजय जैसे नमक मिलाने वाले।  और अपनी दुकान चला कर ऐश भरी जिद्गगी बिताते हैं.

गलती हमारे समाज की है जो इन जैसे लोगों को हम बढ़ावा देते हैं।  अब समय आ गया अपने धर्म और देश के बारे में जानने की समझने की।  अगर हम लोग नहीं समझेंगे तो पता नहीं इन जैसे लोग सनातन धर्म को बेच कर क्या कर डालेंगे।

अगर मेरी बातों से किन्ही क बुरा लगा हो तो मैं माफ़ी नहीं मांग रहा हुँ. जो मैंने देखा, वही लिखा है. अगर फिर भी बुरा लगा है तो मैं माफ़ी मांग सकता हुँ.
Badi Bahas: Supreme Court dismisses plea against removal Sai Baba's idols

सोमवार

Nar Varsh ki Hardik Shubhkamnaye - Happy New Year !

आज का दिन बहुत शुभ और महत्व्पूर्ण है. आज से ही हमारे सनातन धर्म के अनुसार प्रथम दिन है।  आज ही माँ आदि शक्ति का पाठ और पूजा प्रारम्भ हो रहा है।  संसार के  सभी बासियों को इस पावन दिवस कि हार्दिक शुभकामनाये और ईश्वर से ये प्रार्थना करते हैं आने वाला समाय आपके और आपके परिवार के लिए मंगलमय हो।  सारे दुखों का नाश हो और खुशियों कि बरसात हो।  हर तरफ ख़ुशी का माहोल हो।

आओ एक नया दीप जलाये,
खुशियों का
मंगल का  .

आऒ एक नया दीप जलाये
एक नया समाज बनाने का
एक नया अध्याय लिखने का।

आऒ एक नया दीप जलए
विचारों का
अभिवयक्ति का।

आऒ एक नया इतिहास लिखे
एक नया अध्याय लिखे।

जय हिन्द ! वंदे मातरम!


गुरुवार

सजा : बलात्कार को या बलात्कारियों को !


आज हमारे देश के हर एक कोने से एक ही आवाज आ रही है. हमारा कानून ऐसा होना जिससे कोई भी गुनाह करने वाला बचना नहीं चाहिए. चाहे वो कोई आम् इंसान हो या फिर कोई कद्दावर इंसान . लेकिन आपको अपने देश में ऐसा या इस प्रकार का कोई भी कानून मिल पायेगा. नहीं .... क्यूँ कानून को बनाने वाला ही सबसे पहले कानून की धजियां तोड़ता है . ऐसे इस प्रकार की कोई भी आशा निरर्थक है.
आज दो तीन दिनों से , एक लड़की का बलात्कार की घटना से सभी लोग आहात है, पूरा देश कुछ न कुछ सन्देश दे रहा है. चाहे वो आम जनता हो, या कोई अधिकारी और फिर कहे तो वो नेता जो हमारे देश के लिए महान कार्य करते हैं.
उपदेश देना और उस पर कितना अमल होता है. दोनों अलग अलग हैं. हर दिन कोई न कोई उपदेश देता रहता है. लेकिन कोई भी इंसान उस पर कितना अमल करता है. ये उसके सोच पर निर्भर करता है. उसकी सोच पर ही उसका परिवार और समाज का मापदंड शुरू होता है. जैसा सोच होता है वैसा ही इंसान बनता जाता है.
आज हर तरफ से एक शोर सुने दे रहा है. बलात्कारियों को फांसी दो. आम जनता से लेकर नौकर शाही और नेता (महिला नेता) सभी ने एक सुर में कहा है हमारे कानून को थोडा और सख्त बनाने की जरुरत है , लेकिन अभी इसको क्या सजा मिलना चाहिए , किसी ने कुछ नहीं कहा . आखिर सभी कानून बनाने वाले और उसके रक्षक चुप क्यूँ हैं ? आखिर ये चुप्पी कब तक रहेगी ? अगर यही चुप्पी जारी रही तो , ऐसे कांड हमेशा से होते रहे है,,आगे भी होते रहेंगे.
अब समय आ गया है, कुछ करने के लिए. अभी आग लगी हुई है. आम जनता चाहती है. कुछ ऐसा सजा मिले जिससे समाज में ये सन्देश जाए की. अगर आप में से कोई भी इस तरह का घिनौना काम को अंजाम देता है, तो उसके साथ भी  ऐसी ही सजा मिलेगी . लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा ? क्या इसको ऐसे सजा मिलेगी जिससे समाज में एक सन्देश जाए ?
आज सोचने के विषय ये है की , जो ऐसे मानसिकता वाले इंसान कहा से आते है, किस समाज से आते है.  उनके आस पास का वातावरण कैसा है. किस प्रकार उनका रहन सहन है.  क्यूँ की जो इस मिली वो इन सबके समाज से मिलता है. अगर एक सभ्य और संसकारी समाज में शायद ही इस तरह का मानसिकता वाला इंसान मिलेगा.
आज हमें एक संस्कारी और सभ्य समाज का निर्माण करना पड़ेगा अगर ऐसा नहीं करेंगे तो आने वाला समय में हमारी माँ , बहन , बेटिओं को घर से बाहर निकलना तो दूर झाकना भी दुर्लभ हो जाएगा.
ऐसे में हम सब को एक जुट हो कर इस ऐसे सजा की मांग करनी चाहिए जिससे इस समाज में एक सन्देश जाए ताकि इस तरह की शर्मनाक घटना दुबारा न हो जिसे हमारे समाज को सोचने पर विवश हो जाए.
अगर सजा के बारे मुझसे अपनी राइ पूछी जाए तो हम तो यही कहेंगे की बलात्कारियों के एक आँख , एक कान , दोनों हाथ और दोनों पैर काट कर शारीर से अलग कर दिया जाए. उसके बाद उससे किसी चौराहे पर छोड़ दिया जाए ताकि उसे और उसके जैसे सोचने वाले एक नहीं एक करोड़ बार सोचें .फांसी की सजा से उसके कुछ अहसाह ही नहीं होगा , क्या दर्द किस चीज का नाम है, उसे उस दर्द का अहसास करवाना जरुरी है. जब दर्द महसूस होगा , वो दिन याद आएंगे की मैंने जो पाप किया है, उसकी सजा शायद यही है.
जरा सोचो, जिसके ये दर्द मिला है, वो अभी किस हालात हे होगी, उस दर्द सिर्फ वही समझ सकता है, सिर्फ वही जिसे ये मिला है. मै तो ईश्वर से ये पार्थना करता हूँ की उसे सहने की ये शक्ति दे !
लेकिन आज हमारे देश की राजनितिक विचारधारा और उनमे आये हुए नेताओं से इस तरह की अपेक्षा करना पूरी तरह से बेईमानी होगी. क्यूँ  हमारे देश की संसद में बहुत कम ऐसे नेता होंगे जो इस तरह की सजा का देने का पक्ष में  होंगे क्यूँ  अगर वो ऐसा करते हैं , तो उनमे से भी कितनों पर इस तरह के गंभीर मुकदमा चल रहे होंगे. ऐसे में इसे लाना अपने पैर कुल्हाड़ी मरने के बराबर होगा. और कोई भी इंसान अपना नुक्सान कभी नहीं चाहता है.
इंतज़ार अब खतम कनरे की जरुरत हैं , दोषियों की सजा देने और दिलवाने का वक्त आ गया ...आगे बढे एक अच्छे परिवार और समाज का निर्माण करें ताकि इस तरह के इंसान से मुक्ति मिल सके .क्यूँ  अच्छे संस्कार ही एक अच्छा समाज का निर्माण कर सकता है. क्यूँ की गलती किसकी है...ये सोचना हम सबका काम है.

समाज और अखबार


हमारे देश में सभी को कुछ बोलने या कहने की पूरी आजादी है , खासकर समाचार पत्रों को , कह सकते हैं की कोई नियम या कानून भी नहीं है , जो इसको देख सके , की ये क्या आप जनता के पास पंहुचा रहे हैं. अगर हम ये कहे की , जिनके पास इनका शिकयत दे सकते हैं , वो भी इनके जैसे  हैं या इनके ही आस पास के लोग हैं. आखिर में हम शिकायत करे तो किस से करे.
एक कहावत है , " साहित्य समाज का दर्पण है " और ये अक्षरश सत्य है . क्यूँ कि इसका पूरा असर हमारे समाज को बनाने या बिगड़ने में योगदान होता है.
आज का समाचार पत्र या टी . वी . न्यूज़ चैनल , क्या दिखाते  हैं, या क्या दिखाना चाहते हैं. किसी के पास कुछ भी सोचने या समझने की  जरुरत नहीं  हैं .,आखिर वो कहा जा रहे है. या कहा जाना चाहते हैं. समाज पर उनका क्या असर होता है. शायद वो अपने स्वार्थ में पूरी तरह से भूल गए हैं. अपना रास्ता भटक गए है. इसका क्या परिणाम होगा शायद ये भी भूल गए है.
आज समाज को एक मार्गदर्शक की जरुरत है जो इसको एक दिशा दे सके . लेकिन आज कल को जो समय है , वो उलटी गंगा बह रही है.
आज 6 दिसंबर 2012  है , आप जिसे अखबार पर नजर डालेंगे , वही पर आपको सारी दुनिया की खबर को छोड़ कर , सिर्फ अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने की निंदा करते मिलेंगे. हर कोई अखबार बाला मुसलमानों  को अपना जताने और बताने की कोसिस करता नजर आता है. जिस अखबार के कुछ खास लेखक अयोध्या कांड का अपना अपना परवचन सुना रहा है. चाहे वो हिंदू धर्म का या किस गैर धर्म का . सब एक सुर में हिंदुओं को दोष दे रहे है और मान रहे है. सबको लगता है की जो भी कांड हुआ है . जो हो रहा  है, वो हिंदू लोग  मुसलमान को परेशान कर रहे है.
आज २० साल हो गए बाबरी मस्जिद कांड को. लेकिन हर कोई अखबार वाला, एक गुन और भजन गा रहा है. जो हुआ गलत हुआ था , ऐसा नहीं होना चाहिए था. इन सबकी सजा मुसलमान ही क्यूँ भुगते . यहाँ तो मुसलमानों का को कोई इजज्जत नहीं है. हर कोई अपना विचार प्रगट कर रहा है.
लेकिन क्या कोई इसके दर्द को दोनों के तरफ से सोच रहा  है ? क्या गम और दुःख एक तरफ  है ? एक दंगे होते है तो सिर्फ एक समुदाय के लोग मरते या घायल होते हैं ? जो कुछ घटना होता है , तो क्या एक ही समुदाय का नुक्सान होता है. ?
लेकिन ये तो हिंदुस्तान है, हर कोई एक हिंदू  समुदाय को  दोष देता है , आखिर क्यूँ ?  हिंदू के परिवार में सुख दुःख का अहसास नहीं  होता है ? क्या हिंदू लोग दंगे में नहीं मरते या घायल होते है ? तो फिर सिर्फ हिंदू ही दोषी क्यूँ ?
जहा तक मेरा विचार है ,  जो लोग या संस्था इस तरह का विचार देते हैं, या प्रकशित करते है, ये अपनी छोटी और गिरी हुई मानसिकता का परिचय देते हैं. वो कभी भी किसी का अच्छा सोच ही नहीं सकते हैं. कभी किसी का भला नहीं सोच सकते हैं. वो सिर्फ अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु अपना जमीर को बेच देते है. ऐसे में वो अपना देश और समाज के बारे में क्या सोच सकता है. और हमें ऐसे लोगों से कोई अच्छी अपेक्षा भी नहीं रखनी चाहिए.
हिंदुस्तान की जनता तो सही मायने में ज न ता है ये कुछ भी नहीं जानती है. जानते तो वो लोग हैं जो इन भोले भले पढ़े लिखे महामूर्खो  को भी पढ़ा लिखा कर संसद और विधान सभा तक पहुच कर हम सब पर शासन करते हैं. और जब तक हम एक तरफ़ा सोचते रहेंगे ये हम पर राज करते रहेंगे !
सिक्के के दोनों पहलु को देखने वाला यहाँ पर कोई है नहीं. जो देख सकते हैं, वो देखते नहीं है.  जिनको देखना चाहिए. वो तो अंधे और बहरे भी है. ऐसे में क्या आशा करना चाहिए.

जागने का समय है ,
जागना भी चाहता हूँ .
पर जग नहीं पाता  हूँ,
जनता हूँ की , मै देर हूँ,
फिर भी सोच नहीं पाता हूँ.
इन्तहा हो गयी इन्तजार की,
फिर इन्तजार है,
कोई तो आएगा,
नैया पार लगेगा .

रविवार

अपनापन !


अपनापन , सुनने में कितना अच्छा लगता है , लेकिन इसके समझने और जानने में इंसान के जीवन कई वर्ष लग जाते है , तब जाकर कितने लोग इस को समझ पाते है कितने नहीं. सबसे बड़ा सवाल यह है अपनापन का अर्थ समझना. हर कोई अपने सोच विचार कर अपनापन का परिभाषा देता है .

कोई इंसान अपने जीवन में न जाने कितने लोगों से मिलता है , न जाने कितने परिभाषा का निर्माण करता है , हर बार एक नयी सोच को जनम देता है. क्यूँ हम हर बार कही न कही , अपने पिछले विचार से अलग हो जाते है. हर बार का मिलन एक नयी अनुभब को लाता है. ऐसे में लगता है की हम तो बिलकुल ही अनजाने है. हमें तो पता ही नहीं चल पाता है की आखिर हर बार एक नहीं सोच कहा से उभर कर हमारे जीवन के सामने आ जाता है.

जैसे जैसे इंसान अपने परिवार में बड़ा होता जाता है, मतलब की अपने जिंदगी के दिनों को जीता है, और उसको अपने जीवन के जीने का जो अनुभव उसे प्राप्त होता है, आगे जाकर उसे सोचता है. बचपन में हर कोई उसे अपना लगता है , क्यूँ की उसे इस संसार के बारे में कुछ भी पता नहीं है. जैसे जैसे वो बड़ा होता है , एक इंसान को वो समझने लगता है . जो उसके हर बात को मानता है , उसे लगता है की वही सबसे प्यारा और अपना है, दुनिया की सारी खुशिया सिर्फ वही दे सकता है, वही सबसे जयादा प्यार करता है , इस दुनिया में उसके जैसा कोई नहीं है.

उम्र के साथ साथ उसका ज्ञान भी विकास के दौर में होता है. तब तक उसे ये पता नहीं होगा है की कौन उसे से क्या चाहता है . उसके इच्छा के अनुरूप कौन करता है . उनका ख्याल कौन करता है. माता -पिता का क्या फर्ज है. और वो कितना प्यार करते है . क्यूँ सारे गुण - अवगुण हमें उन्ही से मिलते हैं . हमारे घर का क्या संस्कार है. ये हम अपने बच्चे में देख सकते है. अगर हम समय के रहते अगर , अपने बच्चे को नहीं बताया या नहीं संभाला , तो शाद आप कभी भी नहीं संभाल पाएंगे. क्यूँ आगे जाकर तो हम उससे कुछ कह भी नहीं सकते , क्यूँ तब तक उसका यानि बच्चे का कान बंद हो चूका होता है. ऐसे में हम कोई अपेक्षा नहीं कर सकते है. क्यूँ की तब तक वो आप से वो बहुत दूर जा चूका होता है किसी और के पास, जहा से बुलाना आपके बश का नहीं है.

हम हमेशा से अपने बच्चे के साथ प्यार की भाषा देते है लेकिन उस प्यार के भाषा में अनुशाषण भी लाना जरुरी है , अगर ये कम हो गया तो कुछ क्या किसी भी परकार का सोचना बेबकूफी होगा.

हमारे जीवन में अनुशाषण का बहुत बड़ा योगदान है, वो हमें सबसे पहले अपने घर - परिवार से मिलता है , उसके बाद स्कूल से . अगर आप अपने बच्चे के घर से नहीं मिलेगा तो , स्कूल से जायदा की उम्मीद रखना बेकार है. क्यूँ की हमने उसकी जड़े में कमजोर कर दी है, तो ताने क्या ख़ाक मजबूत होंगे. उसमे खूब आप खाद बीज दो , क्या होगा ?

आज कल हमारे देश में भ्रष्टाचार का आग फैला हुआ है, वो एक ऐसा बीमारी है या ये कह सकते है की एक ऐसा वायरस है, जो हर जगह हर किसी को अपने शिकार में फंस रखा है, हर किसी के खून में मिल चूका है, हम कितना भी इलाज कर रहे है, वो ठीक नहीं हो पा रहा है. ऐसे में अगर हम अपने संतान को संस्कार और अनुशाषण से आगे बढाये होते तो शायद ये दिन न देखे पड़ते . क्यूँ आज जो भ्रष्टाचारी है , वो किसी ग्रह से नहीं , बल्कि हमारे ये परिवार और समाज से आया है. ऐसे हमें सबसे पहले अपने संस्कार पर ध्यान देना होगा . जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे भ्रष्टाचार कभी भी समाप्त नहीं होगा.

चरित्र निर्माण एक ऐसे कुंजी है , ज्सिसे से हम समाज के सारे ताले खोल सकते हैं, सारे दुःख का का अंत हो सकता है. सारे पापों का अंत हो सकता है. सारे झगडे का समर्पण हो सकता है. लेकिन ये हो कैसे ? जब तक हम अपने परिवार में ये संस्कार रूपी जड़ी बूटी नहीं लायेंगे और इसके नहीं पियेंगे तब इस बीमारी से इसका इलाज नहीं होगा .

अपना और पराया का परिभाषा हर कोई इंसान समझता है. लेकिन इकतरफा , हर कोई सिर्फ अपना किनारा देखता है, अपना स्वार्थ देखता है, उसे दूसरा इंसान तबी तक अपना लगता है , जब तक उसे से वो किसी न किस प्रकार से उसे फायदा मिल रहा है. लेकिन ये अपनापन नहीं है, ये तो धोखा है, उसके जज्बातों के साथ ,उसके विश्वाश के साथ.

आज का समाज की क्या स्तिथि हो गयी है, हर कोई इससे अवगत है, लेकिन आगे बढ़ कर कौन इसको रोके, कौन कुछ करे , आज तो ये स्तिथि हो गयी है , अगर कोई इसको आगे बढ़ कर करना भी चाहता है, इस समाज के हर कोने से , ये सवाल आता है , "आखिर ये ऐसा काम क्यूँ कर रहा है, जरुर कुछ उसका फायदा होगा या हो रहा है," और उसके बाद कुछ लोग उसको भी समाज की गन्दी जंजालो से इसको परेशान का, उस काम से अलग कर देंगे.

ऐसे लोगों को तो न अपने परिवार से , नहीं इस समाज और देश से कोई अपनापन है, वो सिर्फ अपने लिए जीते हैं , आगे जाकर हमारे समाज और देश का भविष्य निर्माण की योजना बनाते है. ऐसे में देश का क्या होगा , शायद ईश्वर को भी पता नहीं होगा.