बुधवार

 आज मै क्या हर हिन्दुस्तानी स्वंत्रता दिवस कि सालगिरह मना रहा है. मै भी शामिल हूँ. लेकिन सही मायने में आजाद या स्वंत्र हूँ. क्या हमें बात रखने या बोलने का हक है. हमें भी अपने देश में , समाज में कुछ करने या कुछ बोलने का हक है.

संबिधान में जो भी कुछ लिखा है. हर कोई जानता है ये कौन बता सकता है ? मै कहता हूँ कि हम सबको अपने मूलभूत अधिकार या कर्तव्य का ज्ञान है ? हमें कौन से अधिकार मिले हैं. ये हम सबमे से कितने लोग है जितना इनको पता है . कभी हमें इसका ज्ञान होगा ? या हमें कौन जानकारी देगा.?

कोई नहीं है, न तो इसको सरकार बता सकता है , न सरकार का कोई नुमाइंदा . न ही कोई नेता जिसे हमें चुन कर अपने देश और समाज के विकास के विधान सभा और संसद भेजते हैं.

हमारे देश को आजादी मिले कितने साल हो गए. लेकिन हम उस समय से भी बहुत जयादा पिछड़ गए है. जिस तेजी से और सभी चीजों का विकास हुआ उतना हमारे देश के नागरिको और जनता का विकास नहीं हुआ. जनता या नागरिक से मतलब उन लोगों से नहीं जो हमारे जतना के 80 प्रतिशत लोगों से ताल्लुकात नहीं रखते है. वो तो आजादी से पहले से बहुत अमीर थे , अब तो उनके बारे में सोचना भी पाप है गुनाह है.

आज तो हम सब ऐसे जीते है कि पता नहीं कल दिन कैसा होगा ? क्या होगा ? कोई ऐसा है जो यह नहीं सोचता है . शायद नहीं. आज हमारे देश में इतना भय का माहोल है. जितना कि कितना सोचा भी नहीं होगा .

हमारे देश में 70 प्रतिशत लोग , दिन भर काम करते है वो उन्हें रात का खाना मिलता है . ऐसे में अगर वो किसी जुलुस या आन्दोलन के जाते है तो उनका क्या हालत होगा वो उनसे जयादा कोई नहीं बता सकता है.

हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या है .शिक्षा . अभी भी, जब कि हमारे देश को आजादी हुए 60 साल से जयादा हो गए. लेकिन शिक्षा कि क्या स्थिति है. वो हम सब से छुपा नहीं है. शिखा का व्यवसायीकरण तो हुआ ही है. उसके साथ साथ हमारे देश कि गुरु शिष्य परम्परा और शिक्षा पद्धिति का पतन हो गया है. न कोई संस्कार है न कोई संस्कृति .

हम बदलेंगे , युग बदलेगा. बचपन से हम लोग ये सुनते आ रहे है. लेकिन क्या हम सब इस को अपने पर अमल करते हैं. नहीं . ये सिर्फ बोलने के लिए बना है. अगर ये बात जो हमें पता है , सारे रोगों का इलाज यही है. फिर उस दवा को कोई खाना नहीं चाहता , आखिर क्यूँ.

क्या उनसे दुखों से सब लोग खुश है? लगता तो यह है. अगर ऐसा नहीं होता तो हम सब इस "हम बदलेंगे , युग बदलेगा " को अपना कर अपने देश को खुशहाल बना सकते थे.

लेकिन हम ऐसा करेंगे नहीं. क्यूँ हमें मरने और मारने में मजा आता है. और मजा को कौन भूलना चाहता है. मजा चाहे दर्द से हो या खुशी से .


शुक्रवार

देशभक्ति और स्वदेशी बाजार !



आज कल जो हवा बह रही है उससे कोई अछूता नहीं है, क्यूँ हवा ही ऐसे ही नहीं है. वो देश प्रेम , देश भक्ति  और स्वदेश प्रेम , ऐसे में कोई कहा तक भाग कर जा सकता है. हर एक के दिल में देश का प्रेम कही न कही छुपा रहता है. ऐसे में कोई उसके जगाने कि कोशीश करे, इंसान न चाहते हुए भी, थोड़े समय के लिए ही, जाग ही जाता है. मेरे विचार से स्वदेशी होना चाहिए. लेकिन उसे देश प्रेम और देश भक्ति से जोड़ कर नहीं बल्कि इससे से अलग सोच देना चाहिए. !
हमारे देश में आजकल स्वदेशी बनाम विदेशी का खेल चल रहा है. कुछ तो लोग इसको देश भक्ति के साथ गन्दा खेल कर स्वदेशी सामान का बाजार तैयार कर रहे हैं. ऐसे एक लोग नहीं है, बल्कि एक पूरा समाज है जो आम इंसान से कोई ताल्लुक नहीं रखता है बल्कि उसको भावनात्मक अत्याचार और कुछ कह सकते है. आम इंसान को देश का पाठ पढ़ा कर उल्लू या मुर्ख बनाते है और अपना  सामान बेचते हैं. हम सभी देशवाशियों को यह बताना चाहूँगा कि अगर कोई भी इंसान इस तरह से देशभक्ति दिखाना चाहता है तो उसमे अंधविश्वाश नहीं किया जा सकता है.
हमारे देश बहुत सारी कम्पनी है जो अपने देश कि है. लेकिन देशप्रेम और देशभक्ति दिखा कर ऐसा कोई काम नहीं करती कि आम जनता इससे और भी जुड़े. आप इसको गलत रूप न लेकर अपने देश कि अर्थववस्था से जोड़ना चाहिए. हमारे यहाँ गोदरेज , विक्को , निरमा आदि आदि बहुत सी कंपनी है. ऐसे में आप खुद सोचिये और विचार कीजिये. हम और हमारे दोस्त के कुछ निजि विचार है जो कि मै यहाँ पर लिख रहा हूँ. 
कुछ दिनों पहले मैंने एक समाचार चैनल पर देखा कि योग गुरु रामदेव जी का प्रोडक्ट यानि उनके द्वारा संचालित कंपनी दिव्य फार्मेसी का सामान अब खुले बाजार में उपलब्ध होने जा रहा है. मै अगर सही कहू तो , उनके कंपनी का सामान पहले से ही ले रहा था जैसे दंतमंजन, आवला का जूस , मुरब्बा आदि.
मै उनके द्वारा बताया गया प्राणायाम भी करता था और अभी भी करता हूँ. क्यूँ कि उनके द्वारा बताया गया प्राणायाम से मुझे बहुत फायदे हुए हैं. लेकिन उनके योग कैंप का भागीदार नहीं बन सका, क्यूँकि उसका फीस ..... कोई  संदेह नहीं कि उनके द्वारा बताया गया योग और उनके कंपनी का सामान अच्छा नहीं है.
मेरे साथ कुछ दोस्त भी बैठे थे , तभी एक बहस छिड़ गयी , दिव्य फार्मेसी  बनाम दूसरी कंपनी.
लेकिन मुझे एक बहुत बड़ा संदेह है कि, रामदेव जी हमेशा देश , समाज और देशभक्ति कि बात करते हैं. क्यूँ और कैसे , जो मै समझता हूँ या समझ पा रहा हूँ. हमारे देश में ९० पतिशत लोग बहुत ही गरीब है. उनमे से कुछ लोग को मैं गरीबों में अच्छा मान सकता हूँ. अगर देश भक्ति कि बात करेंगे तो सबसे पहले उन ९० प्रतिशत लोगों तक मुलभुत चीजों को पहुचाएं तभी जाकर देश और देशभक्ति समझ में आएगा. चलिए मैं जो कुछ कहना चाह रहा हूँ उनको समझाते हैं, इन सबको लिखने से पहले मैं अपने दोस्तों से भी बात कि थी लेकिन वो सब के सब मुझे कुछ और ही समझा दिए. अब मै यही बातें आप सबके सामने कहना चाहता हूँ. और आप खुद सोचे कि मै गलत हूँ या सही.
रामदेव जी देशभक्ति कि बात करते हैं , वो जहा भी जाते हैं अपना योग और देशभक्ति दोनों उनके साथ चलता है. ऐसे करने और बताने के लिए बहुत कुछ है लेकिन आज हम सिर्फ उनके द्वारा निर्मित उत्पादों के बारे में बात करेंगे .क्यूँ आम आदमी कि पहुँच कहा तक है .
जो उत्पाद वो बना रहे हैं , कई और भी कंपनी है जो बना रही है, ऐसा नहीं ही कि सिर्फ उनके यहाँ ही बनती है . रामदेव जी अपने कंपनी दिव्य फार्मेसी का उत्पाद का ना तो कभी विज्ञापन देते हैं और ना कोई उनका मार्केटिंग होता है. उनका सामान फैक्ट्री से डीलर के यहाँ जाता है और डीलर से सीधे रिटेलर यानि कि दुकानदार के यहाँ पहुच जाता हैं .
अब हम उनके अलावा जो कंपनी अपना उत्पाद हिंदुस्तान में बेच रही है, उसके बारे में बात करते हैं.
सबसे पहले जो सामान बाजार में आना होता है, आने से पहले ही उसका विज्ञापन शुरू हो जाता है , उसके बात उसकी मार्केटिंग . तभी कही जाकर उसके डीलर के यहाँ आता है. फिर आपके दुकानदार के पास पहुचता है.
अब एक उत्पाद के लिए रामदेव जी और दूसरी कंपनी का कितना लागत होगा आप खुद सोच सकते हैं. मैंने कुछ लोगों यानि मार्केटिंग वालों से पूछा तो उन्होंने एक उदाहरण दिया. जो इस प्रकार हैं.
अगर कोई सामन आपके यहाँ १०० रुपए में मिलता है तो ये आप जानिये कि उसकी कंपनी कि लागत सभी टैक्स को देकर ३० रुपये हैं.
१०० रुपये में १० -१५ प्रतिशत तो आपका रिटेलर यानि का दूकानदार का होगा , ३- ५ प्रतिशत आपके डीलर / व्होलेसेलर का होगा , बाकी जो बचा वो आप समझ लो मार्केटिंग  और विज्ञापन का खर्चा हैं.
मै तो ये सोच कर घबरा गया कि इतना सारा खर्चा सिर्फ विज्ञापन और मार्केटिग पर. वाह क्या बात है.
लेकिन जब मैंने रामदेव जी दिव्य फार्मेसी उत्पादों के बारे में सोचा तो और भी आश्चर्य हुआ कि उनके उत्पादों का मूल्य फिर इतना क्यूँ. जबकि उनका तो नहीं कोई मार्किंटेग का खर्चा है, नहीं विज्ञापन का , ऐसे में सारा पैसा कंपनी कोई जाता होगा . आम आदमी तो ऐसे ही पिस रहा है और आगे भी ऐसे ही पिस्ता रहेगा. चाहे कितने रामदेव जी आये और जाए. 
फिर मैंने सोचा कि रामदेव जी और उन सब कंपनियों में फर्क क्या है. तभी मेरे एक काबिल  दोस्त ने कहा बेटा क्वालिटी देखो. यानि उत्पादों कि गुणवता देखो. चलों ये भी देखता हूँ और समझता हूँ. अगर हम गुणवता कि बात करते है फिर भी मूल्यों और लागत में इतना अंतर नहीं आ सकता है.
इसी बहस के दौरान मेरा और दोस्त और  गया , उसने कहा ऐसा है कि अगर हम देश और देशभक्ति कि बात करते हैं तो हमें अपने देशवाशियों के वारे में भी सोचना चाहिए. एक गीता प्रेस भी ही , आज भी उनकी किताबों का कीमत आम आदमी के पहुच हैं. एक रामदेव जी कि किताबों के देखों , पत्रिका देखों, आसमान से बाते कर रहा है. अब हम लोगों का बहस जयादा ही गरम हो रहा था.  अगर ऐसे में हम लोग ऐसे ही बहस करते रहते तो शायद माहोल कुछ और हो जाता .
मै भी सोचता हूँ. सभी कि अपनी अपनी राय और विचार है , हम क्या सोचते है , आप कया सोचते है. सभी का एक सामान विचार नहीं हो सकता है . अगर हम सभी लोग का विचार एक सा होता है , आज हमारे देश कि जो दुर्दशा है शायद कभी न होती . लेकिन क्या करे यही सोच कर रुक जाते है , ठहर जाते . और यही पर हमारा विकास थम जाता है, लूटने वाले किसी न किस परकार से हमें लूट कर चला जाता है . चाहे वो भावनात्मक हो या कुछ और. गलत तो आखिर गलत ही होता है . ऐसे में किसी एक को देश देना सही नहीं . इसमें हम सब जिम्मेदार हैं. रामदेव जी हो या कोई और सबको अपना व्यापार करना है बढ़ाना है . 
यहाँ  पर मै किसी विशेष पर आपेक्ष नहीं लगा रहा हूँ, ये तो हम सबका सोच है . मतलब हमारे निजी सोच है. इससे किसी पार्टी या सम्प्रदाय , समाज से लेना देना नहीं है. अगर ऐसे में किसी को  कुछ दुःख पंहुचा तो मै माफ़ी मांगता हूँ. यहाँ पर मैंने रामदेव जी के नाम उनकी कंपनी दिव्य फार्मेसी के लिए प्रयोग किया है. 



मै और मेरा घर !



बहुत दिनों से , मै सोच रहा था और जानने के कोशिश कर रहा था , हमारे देश में बहुत कुछ समस्याएं और अन्धविश्वाश जैसा वातावरण दिख रहा था . ऐसे ऐसे भी विचार हमारे मन में आ रहा था कि मै सोच सोच कर फव्याकुल हो रहा था . ऐसे ख्याल मेरे मन में क्यूँ आ रहा है. आखिर मै इतना परेशां क्यूँ हो रहा हूँ. धीरे धीरे मै भी इन सब चीजों को भूलने कि आदत डालने लगा, आखिर कब तक ऐसे ही जिया जायेगा. आखिर हम भी एक इंसान है विचार का आना और जाना लगा रहता है, ऐसे में किसी एक को बिठा कर रखने से जिदगी आगे नहीं बढ़ सकती है.
इसी को लेकन मैं एक अपने दोस्त से बात करना चाहा , उसे बताना चाहा कि आज कल मेरे मन बहुत ही अजीबो गरीब ख्याल आ रहे हैं. उसने मुझे समझाया, देखो हम सब एक इंसान है और इस समाज में रहते हैं. ऐसे में हमारा भी कुछ फर्ज बनता है .
समाज और देश के प्रति सिर्फ हमारा ही नहीं , बल्कि देश और समाज में हरएक इंसान का यही फर्ज होना चाहिए. लेकिन मैंने सोचा कि क्या सिर्फ सोचने और बोलने मात्र से हमारा देश और समाज का भला हो जायेगा ?  क्या एक दूसरे पर अपने बात नहीं मानने और काम नहीं करने का बहाना बता कर , अपना हाथ और अपने को इससे से पीछे हो जाना , इससे से  समाज और देश का भला हो जायेगा ? हमेशा दूसरे को आगे बढ़ने पर उसकी पैर खीच कर निचे गिराने के आदत से हमारे समाज और देश आगे बढ़ जायेगा. ? हम सभी अपने कर्तव्य और फर्ज को भूलते जा रहे हैं. आज हमारे समाज में न तो कोई किसी का बात सुनने और समझने के लिए तैयार है न ही समझाने के लिए , ऐसे हम क्या आशा करते है कि आसमान से आकार कर जायेगा. ऐसा बिलकुल नहीं होगा . कुछ पाने के कुछ खोना पड़ता है – ऐसा सभी लोग जानते हैं लेकिन अमल कोई करना नहीं चाहता है .
जहाँ पर देश और देश कि बात आती है, वहाँ पर हमारे कान खड़े हो जाते हैं, दिल में एक जोश सा जग जाता है. लेकिन वही कुछ देश कि लिए करने कि बात आती है , वही हमारा सोया हुआ स्वार्थ ऊपर हो जाता है. हमें अपने देशभक्ति को निजी स्वार्थ के आग में उसे जला कर राख तो बनाते ही है साथ में न जाने कितने के मन अपने और अपने जैसे लोगों के पार्टी घृणा का रोग देकर अपने देश और देशवाशियों को उसमे जलने के लिए छोड़ देते हैं.
आज हमारे देश में बहुत सारे देश भक्त और कुछ नेता लोग (जो देशभक्ति की बात करते हैं ) अपना विचार रख कर देश में कुछ नया करने कि कोशिश कर रहे हैं. सबसे पहले जब भी हम अपने हिंदुस्तान कि बात करते  हैं , सबसे पहले हमें हिंदुस्तान के सभी नागरिक को सचाई का पथ पढाना पड़ेगा , उसे जगाना पड़ेगा. ९० प्रतिशत तो लोग एक जून का खाने के लिए तरश रहे हैं. न तो उसके पास रोजगार है न कोई धंधा . ऐसे में सबसे पहले , हमें अपने उन आवश्यक चीजों को उसके पहुच तक लाने का प्रयास करना चाहिए. ताकि मूलभूत चीजे उनके पास आसानी से आ सकें. यानि मंहगाई को कर करना पड़ेगा. उसके बात हमें उसके शिक्षा पर ध्यान देना होगा उसके बात ही हम उसके स्वस्थ्य के बारे में सोच सकते हैं. ऐसे में अगर हम इन चीजों को छोड़ कर किसी और पर अगर बात करतें है तो वो  बिल्कूल बेईमानी होगी.

बुधवार

विचारों का मृत्यु !


कभी कभी मै कुछ न चाहते हुए भी कुछ सोचने और करने पर मजबूर हो जाते है. उसमे इंसान का कभी कभी जोर नहीं चलता है. इंसान क्या करे और क्या नहीं करे. आखिर ऐसा क्यों होता है , आखिर ऐसा की हो जाता है कि वो नहीं चाहते हुए भी करता है . आखिर ऐसा कौन सा मजबूरी है ?
बहुत सारे सवाल मन में घुमते रहते है. आखिर मै थक कर ये सोचने पर मजबूर हो जाता हू कि मै क्यूँ सोच रहा हूँ. हमारे देश में और भी तो बहुत लोग  है ...वो क्या सोचते है. क्या नहीं सोचते है. उसके बारे में मैं सोच कर अपना वक्त क्यूँ बर्बाद कर रहा हूँ. अपना जीवन के कीमती समय को इन सब बातो में भटका कर क्यूँ नष्ट कर रहा हूँ. !
लेकिन , क्या मै जो कर रहा हूँ या सोच रहा हूँ , यह सही है ? कभी सोचता हूँ अगर मै सिर्फ अपना ही भला सोचता हूँ तब तो ये ये सभी बातें पूरी तरह से सही है.
क्या एक इंसान सिर्फ इतना ही सोच सकता है ? क्या हमारे बीच इंसानियत खतम हो गयी है. क्या हमारे बीच से मानवता समाप्त हो चुकी है. ? क्या हम सब सिर्फ अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए जीते है.?
नहीं....बिलकुल नहीं . अगर ऐसा होता है तो ये संसार कब का संपत हो चूका होता . लेकिन फिर जीवन चक्र चल रहा है. इसका मतलब है कि अभी भी इंसानियत और मानवता बची हुई है.
सवाल यहाँ पर ये है कि वो कहा और कब देखने को मिलेगा....जब पूरी तरह से मानवता और इंसानियत समाप्त होने के कगार खड़ा होगा ? अगर ऐसा है तो ....कुछ नहीं होगा है ....अगर किसी को बचाना हो तो मरने से पहले उसका इलाज करो....मरने के बाद इलाज करने से क्या मिलेगा.....जिदा लाश !
आज हमारे समाज का क्या दशा और दिशा है , सभी लोग इस परिचित है ..कोई भी इंसान इस से अछूता नहीं .......चाहे वो किस भी समाज से रहता हो. छोटे या बड़े सभी लोग में से कुछ लोग इससे से चिंतित है...मै कुछ लोग कहुगा कि जो सबसे ऊपर है ..उन्हें वो लगता है ..कि समाज से या में मैं नहीं ...समाज मुझसे है या चलता है ....और जो एक दम से निचे से आ रहे है....वो इसके प्रति चिंतित नहीं है ..क्यूँ कि उनको न कुछ पता है और न वो कुछ पता करना चाहते है. क्यूँ उनको कुछ मतलब नहीं है ...उनका सीधा सवाल है, समाज ने मुझको दिया क्या ? जो मै समाज से जुदा हुआ मानूं.
तब ऐसे में बचे बीच वाले भाई साहेब... अब वो तो ऐसे फंसे है...जिनका कोई हल नहीं है..उन्हें सांप और छुछुन्दर कि तरह फसे गए है...न तो वो निगल सकते हैं. न उगल (बाहर कर ) सकते है. ऐसे स्थिति में क्या कर सकते हैं. अगर जयादा कुछ करने कि कोशिश करते हैं. समाज के नियम उन्हें पूरी तरह से बाँध देती है. अगर कुछ नहीं करे तो समाज उन्हें जीने नहीं देगा.
आज का समाज , इतने कुंठित हो चूका है कि ....हर इंसान एक दूसरे से कट कर रहना चाहता है...पूरी तरह से पेड के टूटे पत्ते के तरह उससे से अलग हो कर स्वंत्र रहना चाहता है. ऐसे में उस पेड़ का क्या हाल होगा ....जो उसमे पत्ते ही नहीं तो उसको पेड़ कौन कहेगा...उसकी पहचान क्या रहेगी. एक दिन ऐसा समय आयेगा ....जब उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा. फिर इंसान का ,,,,,संसार का हर एक जीव खुद व् खुद समाप्त हो जायेगा.
आज हम सबको एक जुट हो कर परिवार और समाज को विखरने और टूटने से बचाना है. इसके लिए हमें ही कुछ करना पड़ेगा...कोई आसमान से आकार नहीं करेगा.
हमारे समाज में कुछ ऐसे ही प्राणी होते है ...हर हमेशा देश और समाज कि बात करते रहे है...जब समाज को इनकी जरुरत होती है ...तब इनका पता नहीं होता है .ऐसे में इन जैसे लोगों से भी हमारे समाज को बहुत ही बाधा खतरा है.
आज हमारे देश में पचिमी सभ्यता का बहुत प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है. वो दिन दूर नहीं , जब हम पूरी तरह से इस डूब चुके होंगे क्यूँ कि..आज हमारे देश के सभी बडे शहर तो इससे से अछूते नहीं है...धीरे धीरे अब हमे छोटे – छोटे शहर में अपना पांव पसर रहे है., जिस दिने ये गांव में पहुच गए है...समझिए कि पूरी तरह से हमारे भारत वर्ष कि संस्कृति और सभ्यता संपत हो जायेगी.
मै कही और किसी कि सभ्यता को गलत निगाह से नहीं देख रहा हूँ और नहीं बुरा कह रहा हूँ. अगर अच्छी चीजे कही से मिले तो उसे अवश्य लेना चाहिए. आज पूरा संसार हमारे संस्कृति सभ्यता के कायल है. और हम है कि अपने को भूल कर दूसरे को अपनाने में लगे हुए है.
बिखरता समाज और टूटता परिवार ये दोनो ये हमारे देश के लिए विकट समस्या है. अगर हम लोग इस पर ध्यान नहीं दिए तो वो दिन दूर नहीं , जब घर के अलावा कुछ नहीं दिखेगा..
आज कल ये भी सुनने में आ रहा है कि ...बच्चे अपने माता –पिता को अपने साथ रखना नहीं चाहते है.वो या तो उन्हें अपने घर से दुर किसी और घर में या वृधा आश्रम में डाल देते है. अगर जायदा कुछ होता है तो वो कही और छोड़ कर चल देते हैं. ऐसे में उन पर क्या बीतती है. वो उनके अलावा कोई बता नहीं सकता है.
बच्चे जवान होते नहीं कि अपने घर से दूर रहना पसंद करने लगे हैं..अब सोचिये कि अगर ऐसे दशा रही तो हमारे वर्षों पुरानी समाज कि वो परम्परा का क्या होगा है . वो संयुक्त परिवार का क्या होगा ?
ये एक गंभीर समस्या है. अगर हम समय रहे नहीं समझे और कोशिश किया तो ....हमारे देश और समाज का क्या होगा कोई नहीं जानता है...
आप बहुत से परिवार देखें होंगे और देखेंगे , वो बात तो बहुत बड़ी बड़ी करेंगे लेकिन वो इन सब कामो में बहुत आगे रहेंगे.
हमारा देश भारतवर्ष पुरे संसार अपने सनातन धर्म और संस्कृति-सभ्यता के लिए जाना जाता जाता है. लेकिन आज के समय में वही सब नष्ट होने के कगार पर है. यहाँ का हर नागरिक अपने अपने अनुकूल नियम –कानून बना कर कम करता है...जो सोचता है..वही सभ्यता है वही संस्कृति है. और यहाँ तक जो लिख दिया वही संबिधान है.


गुरुवार

विचारों की मृत्यु

कभी मैंने यह सोचा तो नहीं था की कभी की विचार भी मर जाते हैं. लेकिन अब इंसाने के साथ साथ हमारे विचार भी मर ते हैं. ऐसा नहीं है की सिर्फ इंसान ही मरते हाँ. हम पता नहीं अपने इस जिदगी में क्या क्या नही सोचते हैं . और सोचते सोचते इस दुनिया को छोड़ कर चले जाते हैं. अगर कुछ रहता है तो वो हमारा विचार चाहे हो अच्छी हो या फिर बुरी . हमारे समाज में बहुत प्रकार के लोग रहते हाँ. उनके रहने का ढंग उनके सोचने का ढंग यहाँ तक की वो क्या करते हैं मतलब उनके करने का कुछ करने का ढंग भी अलग – अलग होता है.
ऐसा नहीं की हम सिर्फ अलग रहते हैं  बल्कि अलग अलग कुछ सोचते भी हैं. आज जहा और जिस जगह पर हम लोग हैं . शायद ही कोई इसको नहीं जनता है. आज का बच्चा भी ये जानता है  की हमरे परिवार , समाज और देश में क्या हो रहा है , क्या होना चाहिए. जब भी हमारे परिवार की बात होती है तो हम सोचने पर मजबूर हो जाते हैं. अगर वही चीजे हमारे पडोसी के यहाँ हो तो उसके एक बहाना मान कर सिर्फ तमाशा मान कर देखते हैं और एक दूसरे जगह उसकी खिल्लियां और मजाक बनाते चलेंगे. तो फिर आप क्या सोचते हाँ. जब आप अपने पडोसी को सुखी नहीं देखना चाहेंगे वो समाज को क्या देखेंगे.
समाज हमारे देश का प्रतिविम्ब है. अगर हमारा समाज अच्छा होगा समाज के संस्कार जितने अछे होंगे उतने ही हमारे देश का मान और सामान भी उतना ही अच्छा होगा. जब तक हमारे समाज में सुचार नहीं आयेंगे तब तक देश का कुछ भी भला नहीं होने वाला.
समाज की पहली कड़ी परिवार होती है. क्यूँ परिवार से समाज बनता है. परिवार हम जैसे लोगों कसे बनती है . जब तक हम सभी नहीं होंगे . हमारे विचार सही नहीं होंगे एक अच्छे परिवार की कल्पना करना बेईमानी होगी.  अगर हम अपने इतिहास को देखेंगे तो पायेंगे की किस तरह का परिवार होना चाहिए , परिवार का सद्स्य होना चाहिए. एक पिता , एक पुत्र, एक माता , एक बेटी और एक पत्न्नी का एक परिवार और समाज के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए.
हमारे देश में एक से एक महाकाव्य और महाग्रंथ है जो इस बात को बताते है और समझते है . की हमारे क्या संस्कार थे और क्या होना चाहिए. महाकाव्य गीता, रामायण और रामचरित्र मानस को अगर हम पढेंगे और समझेंगे तो शायद हमें और किसी दूसरे को बताने की जरुरत पड़ेगी. मै किसी किएक धर्म या मत की बात नहीं कर रहा हूँ . ऐसा एक संसार के सभी धर्मो में बताया गया है.
परिवार का मुखिया का क्या कर्तव्य होना चैहिये ? ऐसा हम अपने आसपास देखेंगे तो पायेंगे की वो तो एक ऐसा होना चाहिए जो हर किसी कर मान सामान के साथ उसके कर्तव्यों को भी उससे याद और बताते रहने चाहिए. जिससे से उनको अपने और दूसरे के प्रति क्या कर्तव्य है. उन्हें ज्ञात होना चाहिए.
एक पिता का अपने पुत्र और पुत्री और एक पत्नी के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए. ये शायद ही कोई प्राणी नहीं जानता हो. हमारे देश में जनम से लेकर मंरते दंतक लोग एक दूसरे को ज्ञान और अपना कर्तव्य बताते रहते हैं. ऐसे सिर्फ हमारे देश में ही होता है. जो कुछ विचार ही . वो खुद बनते है. और खुद भूल जाते है. पहले एक दूसरे के विचारों का सम्मान करते थे. क्यूँ वो विचार हमेशा से एक दूसरे ,परिवार और समाज के हित में होता था . हमेशा से हो वो लोग परिवार और समाज के हित के लिये होता था. आपसे में इतना प्रेम था की वो कभी भी मेरा नह होता था. वो हमेशा से अपना और हमारा को ही जानते थे.
लेकिन आज का विचार है . वो सिर्फ मेरा और मेरा ही दीखता है और कुछ नहीं. न तो अपने माता – पिता को जानता है . न तो भाई – बहन . सिर्फ और सिर्फ अपना अपना बेटा और पत्नी .
और तो और अपने आस पास कोई भी भूल जाता है .
इतना दुःख होता होगा उनपर जिन्हीने इन जैसे लोगो को जन्म दिया होगा . कैसे ये लोग दिन – रात एक कर अपने बच्चे को पलते है. एक दिन ऐसा आता  है . की यही बच्चे बड़े होकर अपने जनम देने वाले अपने माता – पिता को भूल कर उनहे अपने से दूर चले जाते हाँ. क्या कभी सोचा है. नहीं
लेकिन शायद उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए. की जो वो आज कर रहा है . शायद उनके साथ भी वही कहानी दुहरायी जायेगी. ऐसा नहीं है की वो अपने माता पिता के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करेंगे और उनके साथ ऐसा नहीं होगा. कदापि नहीं.
वो समय को वो भूल जाते हैं. जब वो अपने भाई बहन के साथ अपने जिंदगी का आधा जीवन इनके साथ गुजारते है. वो घर के एक दूसरे के साथ लड़ना झगडना , वो साथ स्कूल जाना , एक थाली में और एक टिफिन में साथ लड़-झगड कर खाना खाना.
कैसे लोग भूल जाते हाँ. वो होली के दिन , वो हो दिवाली क्या बताऊँ ...रोना आ जाता है. कुछ समझ में नहीं आता . जब भी मै सोचता हूँ .....कुछ कह नहीं पाता.
जहा पर मै रहता रहता हूँ...उसी के आस पास एक चाचा जी रहते हाँ...हम लोग उनको चाचा जी रहते है. उनको मै बहुत दिनों से देखता आ रहा हूँ....मै उनकी एक बात क्यूँ बता रहा हूँ....एक ऐसा हुआ की ...चाची जी ...हमारे घर पर आये ...तो मैंने उन्हें बहुत उदास देखा...उनकी उम्र ६० से जयादा थी . उनके चेहरे पर उदासी बता रही थी की जो भी कुछ है वो ठीक नहीं है. बाद में मैंने पाता किया तो मालूम चला की उनके एक बेटा और २ बेटी है. बेटी की शादी हो चुकी है. और बेटा ने लव मरिअजे (शादी) की की है.  जजो उनका बेटा था वो उनका नहीं था  मतलब बेटे को गोद लिया था . अपने बेटे को किसी तरह से लन्दन में पढाया लिखाया. लेकिन जब वो घर आया क्या उनके साथ बिता ..जयादा तो नहीं बता सकता हूँ ..लेकिन जो हुआ वो अच्छा नहीं हुआ. उनके घर में ३ फ्लोर है. निचे वाले पर इनका बेटा और बहु रहती है. पहले वाले पर चाचा और चाचीजी रहती है. आज ऐसा है की वो आपने खाना पीना अलग अलग बनाते है और खाते है. अगर वो बीमार भो होते है. तो न उनका एटा और बहु देखने जाती है. उनकी बेटी अपने घर से आकार सेवा करती है.
तो फिर आप बताइए की आज का विचार कहा पर खड़ा है ....क्या हमारी सोच रह गयी है...हर एक दूसरे अपने लिए सोचते है. कोई भी ऐसा नहीं है जजो अपने से उठा कर परिवार , समाज और देश के प्रति सोचे .
हमारा देश एक ऐसा देश है जहा पर विभिन्न प्रकार के लोग और धर्मानु रहते है. लोग अपने विचारों की ऐसे मार लिया है ...जैसा की जो भी वो कर रहा है और सोच रहा है ..वो सबसे अच्छा है ...मरने के बाद सबकुछ अपने साथ ले जायेगा....

शनिवार

समय : कितना अच्छा और कितना बुरा !

जब हम बच्चे थे तो शायद ये बातें  जो मै बता रहा हूँ शायद हर कोई कितनी बार सुने होंगे. ये ऐसा कथन है जो बिना सुने रह ही नहीं सकता है. वो कथन  है  " समय मूल्यवान है इसे व्यर्थ में नष्ट ना करो " उस समय तो हम  लोग ऐसे है सुनते थे जैसे पता  नहीं क्या पका रहे है फालतू की बात सुना सुना कर हमर भी समय ख़राब करते रहते है . ये बाते हमें कोई ना सुनाये ऐसा नहीं हो सकता है . घर पर हो तो दादा जी , दादी जी , पिता जी , माता जी और हाँ  यहाँ तक बड़े भैया ही ऐसे बाते हमें सुनाया या बताया करते थे.  ऐसे बाते का अंदाजा हमें नहीं था लेकिन १०० प्रतिशत सही है . आप चाहे जो भी सोचें लेकिन मैं इसे सही मानता हूँ. क्यूँ मैंने आज तक जो भी सोचा है पाया है वो वात आज सही जा रही है. जब हम स्कूल में थे उस समय उनकी कही बाते आज भी हमें याद आती हैं और रुलाती है क्यूँ हम लोग उस को बिना जाने टाल जाते थे . कोई बात नहीं थी उस समय हम क्या सोच रहे थे. आज जो भी सोचें लेकिन उसका रिश्ता कही ना कही आज से भी है और कल भी रहेगा .
 जब हम लोग कॉलेज में गये तब तो हमें आदत है नहीं थी सुनने कि . हम तो सिर्फ बोलते थे और सिफर बोलते थी चाहे कि सुने या ना सुने. वो २-४ साल ऐसे गुजर गये कि क्या बताऊँ . जब याद करता हूँ तो लगता है वो एक आजाद समय था ना कोई कहने वाला ना कोई सुनने वाला सिर्फ अपनी धुन थी. लेकिन ऐसा समय कब तक चलने वाला था . जैसे ही हम लोग कॉलेज पास कर निकले कि हमें इस ज़माने का पटा १ साल के अन्दर ही लग गया जब हम एक दूसरे से बिछड़ कर अपने अपने रोई रोजगार के लिए इधर उधर भटकने लगे. तब जाकर हमें मल्लों चला कि दुनिय कैसे है कौन अपना है और कौन क्या है. भैया तब भी हम लोग नहीं संभले . उस समय तक भी हम लोग अपने अपने धुन में गाना गाते चले वही पुराना राग रगते रहे . दिन प्रति दिन बीतने लगा . जब हार कर हमें कोई नौकरी नहीं मिली तब हम अपने घर को वापस चले. जैसे हम लोग अपना घर पहुचते है ऐसा लगता है जैसे हम लोग स्वर्ग पहुच गये . लेकिन कितने लोग ऐसा सोचते हैं . जब हम पढाई कर रहे थे. तब हमें ऐसा लगता नहीं था  क्यूँकि उस समय हम दूसरी दुनिया में जीते थे. क्या मम्मी क्या पापा , है ना , लेकिन जब हमें लगा कि दुनिया कुछ बदली बदली है तब हमें अपने और अपनों का अहसास हुआ . दोस्तों समय कब बुरा हो जाए कोई नहीं जनता है . परन्तु हमर माता पिता हमेशा ही चाहे समय कितना ही ना बदल जाए उनका वक्त आपके लिए नहीं बदलत है. वो हमेशा एक सा ही होता . आप हमेशा ही उनके लिए छोटे बच्चे के सामान होते है .

मंगलवार

देश का भविष्य : दशा या दुर्दशा

किसी भी देश का भविष्य हमारे बच्चों पर निर्भर करता है. लेकिन हमारे देश में बच्चों के प्रति जो नजरिया है या हम लोग देख रहे है. क्या आपको लगता है कि आगे जाकर यही बच्चे हमारे देश का कर्णधार होंगे. कभी नहीं. क्यूँ ९० पर्तिशत तो कुपोषण का शिकार हैं. कुछ बच्चे तो जो चाहते है वो मिल जाता है  लेकिन हमारे देश में देश में ऐसे भी बच्चे है जिनको दो वक्त का खाना भी नहीं मिल पटा है . शिक्षा कहा से लेंगे .
अभी हमारे समाज को बहुत कुछ बदलना पड़ेगा . अपनी सोच का दायरा बढ़ाना पड़ेगा . उंच नीच को मिटाना पड़ेगा . विचारों कि संकीर्णता को हटाना पड़ेगा तभी इन बच्चो का भविष्य कुछ हो पायेगा.
ऐसे में अगर कुछ संस्थाए नहीं हो तो क्या होगा इश्वर ही नहीं जान पाएंगे. अगर जो कुछ इस के लिए कुछ हो रहा है कुछ बिना लाभ वाली संस्थाए कर रही है . ऐसे  हम सबको एक जुट कर इनके ऐसे संस्थाए को मदद करनी चाहिए. जिससे इन बच्चे के साथ हमारे देश का भला हो सके.
अक्सर हमारे देश में इन गरीब बच्चो के लिए पैसा अआते है लेकिन इनके पास कितना और क्या पहुचते है. शायद कोई नहीं जानता है. आज हमारे देश के हर राज्य में कितने ही बिना प्रोफिट वाली संस्थाए काम कर रही है . ऐसे में हमें आगे आकार इनका स्वागत और मदद कर कुछ हौसला बाधा सकते हैं जिनसे ये आगे काम कर सके .