सोमवार

जिंदगी के खूबसूरत क्षण

क्या क्षण थे ,
कभी हमारे जिन्दगी के
कभी हँसते ,
कभी रोते थे.
फिर भी हमें कोई
गम नहीं था
क्यूँकी  हमारे चाहने वाले कई थे .
हर रोज कटता था
मजे में
खुशियों में
ना किसी की चिंता थी
ना किसी के ले कोई ख़ुशी थी
सिर्फ अपने धुन की
मस्ती में
मुस्कुराता
और
गमगीन
रहता था.
क्या दूसरा
और क्या अपना
सभी कुछ
एक सा
लगता था
क्यूंकि मुझे पता नहीं था
की दुनिया भी कोई चीज है
इसलिए हमेशा ही मगन रहता था.
सभी मेरे लिए अनजाने थे
बेगाने थे
इसलिए तो हमें
किसी से ना कोई फ़साने थे
ना स्वार्थ की दरिया थी
ना ही अहंकार का समुन्द्र था
बस था
तो एक
ही था
जो हर के साथ है
पर दिखता
नहीं .
कैसे कहू
और किसको
कहूँ
की
कौन अपना और कौन पराया था.
क्यूँ वह पर तो
हर कोई
अपना था.

2 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

कैसे कहू
और किसको
कहूँ
की
कौन अपना और कौन पराया था.
क्यूँ वह पर तो
हर कोई
अपना था.
गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

Ajay sharma ने कहा…

Ram shaker ji ,

Appka blog padke bahut he accha laga .

Maan tou karta hai ki In bachoon ki sewa ki jae , But phir wohi baat aa jati hai ki jin "TRUST" ko paise dengey , Kya woh unka sahi Upyog karengi >..

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Regards
Ajay Sharma